दवा कोई

कर देगी सब कुछ पहले जैसा
सुनते हैं आयी है ऐसी दवा कोई

कुछ इत्र सा फैला है फिज़ाओं में
छूकर आयी है तुझको हवा कोई

ले लेने दो हमको सुकूँ पल दो पल
मत छेड़ फिर से तू शिकवा कोई

क्या है रोज़-ओ-शब नयी बेताबी सी
हुआ अरमाँ मेरा शायद जवां कोई

है भला कहाँ का इन्साफ अमित
करे गलती कोई हो रुसवा कोई

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 169

नया क्या है

है मर्ज़ वही पुराना दवा क्या है
नए साल में आखिर नया क्या है

रखता है परहेज़ वो अब भी मिलने से
शायद नहीं जानता वो दया क्या है

क्या पढ़ेगा वो जो हमने लिखा नहीं
जो पूछता है हमसे बयां क्या है

सूख चुके हों जिन आँखों के आँसूं
वो झुकें भी तो उनकी हया क्या है

करके दिल्लगी हमसे पूछते हो अमित
इस खेल में तुम्हारा गया क्या है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 167

याद है तुम्हें ?

हाथों में देके हाथ जो किया था तुमने
क्या अब भी वो अहद याद है तुम्हें

जहाँ पर आखिरी बार मिले थे हम
ख्यालों की वह सरहद याद है तुम्हें

और वो पहली मुलाकात हमारी
क्या उसका उन्माद याद है तुम्हें

वो जो हम में तुम में करार था
क्या उसकी बुनियाद याद है तुम्हें

की तुमने तो बस दिल्लगी “अमित”
पर हुआ कौन बर्बाद याद है तुम्हें

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 165

तपिश मेरी

जलते हैं अरमान, जलते हैं अल्फाज़ मेरे
तुम तलक पहुँचती नहीं तपिश मेरी

पहले मुझमें चाँद नज़र आता था तुमको
बेअसर कब हो गयी कशिश मेरी

सहेज कर रखा है हर एक दर्द तुम्हारा
महबूब है मुझको अब ख़लिश मेरी

देर तलक देखी थी हमने राह तुम्हारी
इश्क़ से पर जीत गयी रंजिश मेरी

अब क्या यही है तुमसे मिलने की सूरत
कोई तुम से कर दे सिफारिश मेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 164

बीमार नहीं हूँ

बदल गया है ज़माने का चलन
घर पर हूँ पर लाचार नहीं हूँ
अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार नहीं हूँ

मिल नहीं पाता हूँ अब उनसे
मुनासिब है भूल जाऊँ उन्हें
कह दो उनसे मैं तैयार नहीं हूँ

मिला है वक़्त सोचने का मुझे
जो भी किया अच्छा बुरा
अपने किये पे शर्मसार नहीं हूँ

करता हूँ कुछ ज्यादा काम
खटता हूँ रोज़ सुबह से शाम
शुक्र है कि बेरोज़गार नहीं हूँ

रखता हूँ अपना ख़याल ज्यादा
एक ज़िन्दगी तो हज़ार नेमत
मनाता हूँ खैर, बीमार नहीं हूँ

In Response to: Reena’s ~Exploration Challenge # 163

इबादत

करके इबादत बना दिया मैंने खुदा तुझे
डरता हूँ अब बख़्शेगा क्या मेरा ख़ुदा मुझे

होते थे खुश सुनकर कभी हमसे अपनी तारीफ़
लगती है अब गुस्ताखी सी क्यों ऐ ख़ुदा तुझे

सुनते थे कि प्यार का भूखा होता है ख़ुदा
लगती नहीं क्यों वो पहले सी भूख ख़ुदा तुझे

काश करता कोई हमसे भी मुहब्बत हम सी
सिखला देते कैसा होता है खुदा तुझे

लगता है डर तेरी ऊँचाइयों से “अमित”
कैसे पहुंचूँ तुझ तक बतला दे ख़ुदा मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 162

तम नहीं है

यूँ तो ज़िन्दगी में अँधेरे कम नहीं हैं
जब तुम हो संग हमारे, तम नहीं है

छट चुकी है सारी ग़म की घटाएँ
देख लो आँखें हमारी नम नहीं हैं

दिवाली पे देख रौनक तेरी कैसे कहें
है अमावस की रात, पूनम नहीं है

कह देता तुझसे प्यार नहीं है मुझे
पर कैसे कहूं क्या मेरा अन्तर्मन नहीं है

छोड़ कर गली तेरी कहाँ जाऊँ “अमित”
है कौन जगह जहाँ तेरी अंजुमन नहीं है

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 161

तसव्वुर तेरा किए हुए

बैठे रहे हम घंटो तसव्वुर तेरा किए हुए
डूबते उबरते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

वक़्त-ए-वस्ल कुछ यूँ लगा नश्तर तेरा
तुझपे हम मरते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

कर दिया जो तूने कल मिलने का वादा
शब को सहर करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

हुआ जो भी अब तक हमारे संग अच्छा बुरा
तेरे नज़र करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

होती है दिल से दिल की राह “अमित”
तुझको खबर करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 160

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