निकला ही नहीं

फिर तेरी जुल्फ के जाल से निकला ही नहीं
इश्क़ के ख़ूबसूरत जंजाल से निकला ही नहीं

किस तरह आती गई रात एक पल भी नींद
डूबा तो फिर तेरे ख़्याल से निकला ही नहीं

उठ गयी जो मेरी नज़र एक बार तेरी जानिब
दिल उस एक कमाल से निकला ही नहीं

क्या है उन्हें अब भी पहले की सी मुहब्बत
क्यों मैं कभी इस सवाल से निकला ही नहीं

जीता रहा तू ताउम्र होकर नाउम्मीद अमित
क्यों ज़िन्दगी के बवाल से निकला ही नहीं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 154

आशार तेरे हैं

फ़िर आया ख़याल तेरा, फिर निकले आशार नए
ये ख़याल तेरा है या आशार तेरे हैं

जिस सिम्त देखता हूँ, तू ही नज़र आता है
तू ही बतला क्या रूप हज़ार तेरे हैं

चलो आओ करें इस गुलिस्तां का बॅटवारा
रख लो तुम फूल सभी ख़ार मेरे हैं

हर शख़्स लगता है मुझे चोट खाया हुआ
इस शहर में क्या सब बीमार तेरे हैं

क्या करे कोई तुझसे शिकवा गिला अमित
अपनी सफाई में बहाने तैयार तेरे हैं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 153

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