अनबुझी आग

समंदर है तत्पर मगर
कैसी है यह आग जो बुझती ही नहीं ।१।

ताकता हूँ शीशा मगर
कैसी है यह सूरत जो दिखती ही नहीं ।२।

बनाये कितने पुल मगर
कैसी हैं दूरियां जो मिटती ही नहीं ।३।

कोई वादा नहीं मगर
कैसी है यह आस जो घटती ही नहीं ।४।

मेरे भी थे वो कभी
कैसी है किस्मत जो टिकती ही नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 45

यूँ ही राहों में

सोचता हूँ क्या पूछता तुमसे
मिल जाते गर यूँ ही राहों में

मुड़ कर भी न देखा तुमनें
न था कोई असर मेरी आहों में

कुछ भी हो पर नहीं गवारा
देखूं तुम्हें गैर की बाँहों में

कैसे मानूं सब भ्रम था मेरा
देखा था प्यार तेरी निगाहों में

जो भी चाहो सज़ा दो मुझको
था प्यार छिपा मेरे गुनाहों में

रंग कहाँ हैं

प्यार भरी पुचकार कहाँ है
अन्याय पर हाहाकार कहाँ है

जीने का अब ढंग कहाँ है ।१।

चेहरे सारे झुके फोनों पे
देखे कौन हया की लाली

ध्यान इतना भंग कहाँ है ।२।

निकले भी नहीं कालेज से
लगता है जीवन बोझ सा

जीने की उमंग कहाँ है ।३।

भूखें मरते देखें बच्चे पर
निकले न हमसे फूटी कौड़ी

पॉकेट इतनी तंग कहाँ है ।४।

सूखे कुँए और सूखे ताल
पानी को तरसें प्यासे पंथी

झरनों की तरंग कहाँ है ।५।

इंद्रधुनष के रंग सारे
छिप गए धुएं भरी धुन्ध में

आसमां में रंग कहाँ हैं ।६।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 44

Blog at WordPress.com.

Up ↑