किस बात को सच मानूँ

किस बात को सच मानूँ मैं
तेरे होठों के इंकार को या
आँखों के इक़रार को

कहीं ठुकरा न दे तू मुझे
डरता है यह बुजदिल दिल
अपने तिरस्कार को

और अगर हाँ कह दी तूने
क्या संभाल पाऊँगा मैं
भावों के उद्गार को

अनबुझी एक पहेली है तू
कब समझ पाया है अमित
हुस्न के असरार को

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 94

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