अल्फाज़ मेरे

कहाँ से लाऊँ अशहार कि गज़ल बने
दफ़्न हैं अल्फाज़ मेरे ख्वाबों के साथ

ये इनायत तुम्हारी कुछ कम तो नहीं
कर दिया मशहूर मुझे ख़िताबों के साथ

उलझा दामन तो समझे राज़-ए-गुलशन
होते हैं काँटे भी अकसर गुलाबों के साथ

महकता है ख़ुश्बू से क़ुतुब खाना मेरा
रखे हैं कुछ ख़त तेरे किताबों के साथ

अच्छा होता तुम चुप ही रहते अमित
क्यों तोड़ा दिल मेरा जवाबों के साथ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 184

ख़ुमारी तेरी

कुछ मय का नशा कुछ बेक़रारी मेरी
शीशे में उतर आयी है ख़ुमारी तेरी

हैं साँसें तेज़, दम है बस निकला सा
जान लेके जायेगी यह बीमारी तेरी

सुर्ख़ होंठों पे उन्माद, आँखों में हसीँ
गोया पूछ्तीं हैं क्या है तैयारी तेरी

चूमते हैं बेहयाई से क्यों गर्दन तेरी
अच्छी नहीं ज़ुल्फ़ों से यह यारी तेरी

है दीवानगी का ऐसा आलम अमित
अब लगती है जुदाई भी प्यारी तेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 183

हो जाता है

कोई भी जानबूझकर नहीं करता है मुहब्बत
यह गुनाह तो इंसां से अनजाने में हो जाता है

पी आँखों से तेरी और किसी को ख़बर नहीं
है बदनाम वो शख़्स मयख़ाने में जो जाता है

यूँ तो पढ़ लिया है तेरी खामोशी में इक़रार
पर एक बार होठों से बताने में क्या जाता है

मिलते हैं हमसे गोया एहसान सा करते हैं
है ऐसा ऎतराज़ तो ठुकराने में क्या जाता है

वक़्त-ए-रुखसत गर हुई इत्तला उन्हें अमित
क्या बोलेंगे हँसकर वो जाने दो जो जाता है

तकदीर का मोहरा

गर उसके घर में देर है अंधेरा नहीं है
तो क्यों वो शख़्स अब तक मेरा नहीं है

क्यों नहीं कटती है यह काली रात
एक मेरे ही घर में क्यों सवेरा नहीं है

होते थे हम भी कभी उसको अज़ीज़
अब उसकी तस्वीर में मेरा चेहरा नहीं है

कि काश रोक लेते हम उस दिन उसे
वक़्त किसी के रोके से ठहरा नहीं है

क्या ग़म जो हारा तू यह बाज़ी अमित
है कौन जो तकदीर का मोहरा नहीं है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 178

तू नज़र आता है

ऑंखें बंद कर लूँ तो भी तू नज़र आता है
टूटे आईना-ए-अना में तू नज़र आता है

हुई मुद्दत हमें तेरा विसाल किये हुए
फिर भी हर कल्पना में तू नज़र आता है

कोई हमसे पूछे क्या मज़ा है जलने में
परवाना हूँ शमा में तू नज़र आता है

कभी तो तू छत पर नज़र आ ज़ालिम
यूँ तो चन्द्रमा में तू नज़र आता है

मिलता है हर शख़्स देने तसल्ली अमित
या हर सांत्वना में तू नज़र आता है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 177

इबादत

करके इबादत बना दिया मैंने खुदा तुझे
डरता हूँ अब बख़्शेगा क्या मेरा ख़ुदा मुझे

होते थे खुश सुनकर कभी हमसे अपनी तारीफ़
लगती है अब गुस्ताखी सी क्यों ऐ ख़ुदा तुझे

सुनते थे कि प्यार का भूखा होता है ख़ुदा
लगती नहीं क्यों वो पहले सी भूख ख़ुदा तुझे

काश करता कोई हमसे भी मुहब्बत हम सी
सिखला देते कैसा होता है खुदा तुझे

लगता है डर तेरी ऊँचाइयों से “अमित”
कैसे पहुंचूँ तुझ तक बतला दे ख़ुदा मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 162

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