तेरी ही क़सक

जिस सिम्त देखता हूँ मैं
तुझमें ही उलझ जाता हूँ
तेरी ही झलक पाता हूँ ।१।

कहाँ खोजूं खुद को मैं
कोई पहचान नहीं मेरी
तेरी ही ललक पाता हूँ ।२।

बदली में ज़ुल्फ़ के साये
सूरज की हर किरन में
तेरी ही दमक पाता हूँ ।३।

आफ़ताब सा चेहरा तेरा
तुझसे आँखें मिलते ही
तेरी ही शफ़क पाता हूँ।४।

बहुत दिन बीते अमित
अब भी शाम-ओ-सहर
तेरी ही क़सक पाता हूँ।५।

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 70

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