अपनी बात

बीती उम्र करते हुए बातें सबकी
चलो आज अपनी बात करते हैं

हुई मुद्दत अब तो खुद से मिले हुए
आज खुद से मुलाक़ात करते हैं

यूँ तो शांत हवा के झोंके से हैं हम
छेड़ो हमें तो झंझावात करते हैं

सीखा हमने हमेशा वफ़ा निभाना
हैं और जो अपनो पे घात करते हैं

है अभी बाकी हम में दम अमित
ऐलान आज हाज़रात करते हैं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 175

ज़िद

बस एक बार कर लो इकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

मत समझो इसको इसरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

नहीं सह पायेंगें हम इंकार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

जाने दो मत करो तकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

हुआ तेरे बिन जीना बेकार
करते तो तुम भी हमसे प्यार

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 174

बह जाता हूँ

यूँ तो समझदारी में कमी नहीं मेरी
जाने क्यों जज़्बातों में बह जाता हूँ

जानता हूँ झूठ है फ़ितरत में तेरी
फिर भी तेरी बातों में बह जाता हूँ

दिन भर तो ख़्याब संभालता हूँ तेरे
कच्चा बाँध हूँ रातों में बह जाता हूँ

कौन तस्सवुर करे रुस्वाई के बाद
आशिक हूँ चाहतों में बह जाता हूँ

सोचता हूँ तोड़ दूँ सारे बंधन अमित
बेबसी है कि नातों में बह जाता हूँ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 173

वक़्त की दहलीज़ पर

होकर बे-आबरू तेरे कूचे पर
बैठा हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

दे मुझे एक टुकड़ा बासी लम्हा
माँगता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

न की पहले कभी कदर तेरी
सोचता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

था ज़माना ठोकर में जिसके
रेंगता है वक़्त की दहलीज़ पर

गर नहीं उसके घर अंधेर अमित
मिलेगा तू वक़्त की दहलीज़ पर

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 172

ऐतबार

न होते हम तो
कौन करता परवाह तुम्हारी
कौन करता तुमसे प्यार इतना

था कौन भला
जो सुनता सभी बातें तुम्हारी
किसपर था तुम्हें अधिकार इतना

सिखाई हमने
तुम्हें प्यार की क़ीमत
क्यों महँगा पड़ा न इज़हार इतना

होकर रुसवा भी
रखोगे मेरे राज़ सभी महफूज़
क्यों करती हूँ तुमपर ऐतबार इतना

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 171

आशा की किरन

छटी नहीं है ग़म की काली घटा अभी
पर दिखती है आशा की किरन मुझे

कितनी गहरी होगी सोचो प्यास मेरी
लगता है दरया एक कतरा शबनम मुझे

सुनते है भर देता है वक़्त हर घाव
कैसी है यह फिर सीने में चुभन मुझे

किसको फुर्सत सुनता कोई नग़मा मेरा
हर शख़्स मिला अपने में मगन मुझे

नहीं रही मेरी पहले सी सूरत “अमित”
मत दिखलाओ अब कोई दर्पन मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 170

इबादत

करके इबादत बना दिया मैंने खुदा तुझे
डरता हूँ अब बख़्शेगा क्या मेरा ख़ुदा मुझे

होते थे खुश सुनकर कभी हमसे अपनी तारीफ़
लगती है अब गुस्ताखी सी क्यों ऐ ख़ुदा तुझे

सुनते थे कि प्यार का भूखा होता है ख़ुदा
लगती नहीं क्यों वो पहले सी भूख ख़ुदा तुझे

काश करता कोई हमसे भी मुहब्बत हम सी
सिखला देते कैसा होता है खुदा तुझे

लगता है डर तेरी ऊँचाइयों से “अमित”
कैसे पहुंचूँ तुझ तक बतला दे ख़ुदा मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 162

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