दिल-ओ-दिमाग़

सोचता भी तुम्हें हूँ, चाहता भी तुम्हें हूँ
दिल-ओ-दिमाग़ पर इस कदर छाई हो तुम ।१।

कुछ और तो ज़हीन ज़ेहन को भाता नहीं
जब से इस पागल दिल को लुभाई हो तुम ।२।

कितनी दूर तक तुम चलोगी साथ मेरे
हो रूह मेरी, या मेरी परछाई हो तुम ।३।

क्या करती हो अभी से ज़िक्र रुख़सत का
कर लूँ दीदार कि अभी तो आयी हो तुम ।४।

कैसे करूँ तुम को लब्ज़ो में बयां अमित
फ़कत ढाई अक्षरों में समाई हो तुम ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 119

पुरानी बातों का

कर दें न फिर से ऑंखें नम
मत कर ज़िक्र पुरानी बातों का ।१।  

इनकी माने तो मेरे हमदम तुम हो
ऐतबार क्या है पुरानी बातों का ।२।  

रह जाए थोड़ा मेरा भी भरम
कुछ रख मान पुरानी बातों का ।३।  

दे रहे हो मुझे नया एक सपना
सौदागर नहीं हूँ पुरानी बातों का ।४।  

न होती वों तो क्या जीता अमित
चल मान एहसान पुरानी बातों का ।५। 

तलब मुस्कुराने की

हमने ही क़द्र नहीं की शायद तुम्हारे प्यार की
कोशिश तो की थी तुमने पास आने की ।१।

घड़ी भर के लिए तो बैठो हमारे पहलू में
अभी तो आयी हो, करती हो बात जाने की ।२।

सोचता था उम्र पड़ी है सुलझा लूँगा जब चाहूँ
आज इस डोर की बारी है इतराने की ।३।

बहुत तेज़ है अभी वक़्त की हवाओं का मिज़ाज
मैं इंतज़ार में हूँ बवंडर के थम जाने की ।४।

बहुत कुछ गवाया है तूने, कर हिसाब अमित
क्या रंग लायी है तेरी धुन कमाने की ।५।

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