तम नहीं है

यूँ तो ज़िन्दगी में अँधेरे कम नहीं हैं
जब तुम हो संग हमारे, तम नहीं है

छट चुकी है सारी ग़म की घटाएँ
देख लो आँखें हमारी नम नहीं हैं

दिवाली पे देख रौनक तेरी कैसे कहें
है अमावस की रात, पूनम नहीं है

कह देता तुझसे प्यार नहीं है मुझे
पर कैसे कहूं क्या मेरा अन्तर्मन नहीं है

छोड़ कर गली तेरी कहाँ जाऊँ “अमित”
है कौन जगह जहाँ तेरी अंजुमन नहीं है

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 161

पढ़वा देना उनको

हाल-ए-दिल तमाम पढ़वा देना उनको
मेरी कतबा-ए-मज़ार पढ़वा देना उनको

हुआ फ़ना एक और आशिक़ उनका
सुर्ख़ी-ए-अखबार पढ़वा देना उनको

बहुत देर कर दी आने में उन्होंने
खुली आँखों में इंतज़ार पढ़वा देना उनको  

पा जाएँ मंज़िल अपनी जज़्बात मेरे
अनखुले ख़त हज़ार पढ़वा देना उनको

गर बचीं हो कुछ साँसें “अमित” अभी
मेरा पैग़ाम-ए-इज़हार पढ़वा देना उनको

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 159

न रहे


तुम तुम न रहो, हम हम न रहें
हम दोनों के दरम्यां कोई फासला न रहे

छीन लो मुझसे तमाम प्यास मेरी
हो सामने जाम, उठाने का हौसला न रहे

यूँ मिटा दो अपने सभी शिकवे गिले
फिर रूठने मनाने का सिलसिला न रहे 

मिले सज़ा न मिले वज़ह-ए-सज़ा
किसी भी गुनाह का ऐसा सिला न रहे

हो क़ातिल तुम्हीं बन बैठे हो मुंसिफ़
“अमित” के हाथ कोई फैसला न रहे 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 158

फिर भी

तेरी आँखों में डूब के देखा फिर भी
माप सका न तेरी गहराई फिर भी

रह नहीं सकते बिन हमारे एक पल
करते हो क्यों हमसे लड़ाई फिर भी

जब मालूम था अंज़ाम-ए-मुहब्बत
क्यों अपनी जान फसाई फिर भी

क्यों नहीं मिलती है रौशनी हमें
खुद घर में आग लगाई फिर भी

मालूम है वो हैं बेमुरव्वत “अमित”
देता है क्या उनकी दुहाई फिर भी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 157

कब तक

इस दिल को सताएगी तेरी याद कब तक
है तुझसे मेरे इश्क़ की मियाद कब तक

खोल कर ज़ुल्फ़ मुझसे करते हैं ताकीद
क्या है इरादा, होगा तू बर्बाद कब तक

किसे ढूँढ़ती फिरा करती हैं ये निगाहें तेरी
जा चुका है, करता वो फ़रियाद कब तक

कौन आया कल रात फ़िर ख़्याब में मेरे
मेरी जुबाँ पे बाकी किसका स्वाद अब तक

क्यों नहीं हुआ तू नाउम्मीद अब तक “अमित”
किस याद ने रखा है तुझे शाद अब तक

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 156

सूरत भी नहीं

अब वस्ल-ए-यार की सूरत भी नहीं
इज़हार-ए-प्यार की सूरत भी नहीं

क्यों पूछता है यह ज़माना हाल मेरा
जब मेरी बीमार सी सूरत भी नहीं

तकता हूँ चेहरा उसका उम्मीद के साथ
अब उसके इकरार की सूरत भी नहीं

उतार दी है कश्ती इस तूफां में मैंने
किस्मत में पतवार की सूरत भी नहीं

क्या ढूंढ़ता है इस आईने में “अमित”
अब तेरी पहले सी सूरत भी नहीं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 155

निकला ही नहीं

फिर तेरी जुल्फ के जाल से निकला ही नहीं
इश्क़ के ख़ूबसूरत जंजाल से निकला ही नहीं

किस तरह आती गई रात एक पल भी नींद
डूबा तो फिर तेरे ख़्याल से निकला ही नहीं

उठ गयी जो मेरी नज़र एक बार तेरी जानिब
दिल उस एक कमाल से निकला ही नहीं

क्या है उन्हें अब भी पहले की सी मुहब्बत
क्यों मैं कभी इस सवाल से निकला ही नहीं

जीता रहा तू ताउम्र होकर नाउम्मीद अमित
क्यों ज़िन्दगी के बवाल से निकला ही नहीं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 154

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