Social distancing

you had been going distant before
Covid-19 is just an excuse
you stopped talking anymore
you had been going distant before
in my words now I emotions pour
you know, you are my muse
you had been going distant before
Covid-19 is just an excuse

नाइत्तिफ़ाक़ी

रखते हैं वो नाइत्तिफ़ाक़ी मेरे हालत से यूँ
देख अपनी ख़ुमारी समझते हैं शराबी हमको ।१।

सुनकर इज़हार-ए-वफ़ा आती है हँसी उनको
लगती हैं तमाम बातें हमारी किताबी उनको ।२।

न देखे उनको तो नहीं आता है दिल को सुकूं
कौन जाकर समझाए हमारी यह बेताबी उनको ।३।

वो जो देते थे कभी ख़ुदा का दर्ज़ा हमको
हमारे किरदार में दिखती है खराबी उनको ।४।

पाते ही हमने खो दिया पल भर में उन्हें
रास न आयी “अमित” कामयाबी हमको ।५।

सोचते रहते हो क्या

होते नहीं जब रुबरु तुम्हारे
सोचते रहते हो क्या हमको ।१।

अपनी आँखों के कोने से
तकते रहते हो क्यों हमको ।२।

अभी अभी तो तुम आये हो
जाने की धमकी देते हमको ।३।

रोज़ बनाते हो नया बहाना
बच्चा समझा है क्या हमको ।४।

खुद को तुम में खो चुके हैं
क्या देखा है खुद में हमको ।५।

दिल-ओ-दिमाग़

दिमाग़ कहता है बेवफ़ा हैं वो
नहीं मानता दिल उनका कुसूर
मुक़दमे में कौन जीतेगा दलील ।१।

वो रक़ीब से नज़दीकियां उनकी
सब कीं दिमाग़ ने दर्ज़ मगर
पूछे दिल क्या वे इतने अश्लील ।२।

हैं बहुत शातिर वे ,याद करे दिमाग़
उनकी सारी चालाकियाँ
माने दिल अब भी उनको नबील।३।

दिल कहे अमित मना ले उनको
पर रोक लेता है दिमाग
होना पड़ेगा फिर से ज़लील ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 111

बन कर जुगनू

जब रात होती है सबसे स्याह
होती नहीं आशा की किरण
बन कर जुगनू आती हो तुम

जब जीवन लगने लगे वीरान
अर्थहीन, नीरस और रंगहीन
बन कर ख़ुशबू आती हो तुम

दिन भर की आपाधापी में
मिलते हैं कितने ही आघात
बन कर चन्दन आती हो तुम

नहीं रहे जब कोई पूर्वाग्रह
हो चुका हूँ सपनों से आज़ाद
बन कर बंधन आती हो तुम

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 110

लाज़मी तो नहीं

ख्वाब देखता हूँ मैं
हर ख्वाब की ताबीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।१।

तेरे इश्क़ में भी मेरे
जुनूं की तासीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।२।

रंग भले सच्चे हों
सच्ची हर तस्वीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।३।

तेरी नज़रें ही काफ़ी हैं
क़त्ल के लिए शमशीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।४।

जो तू चाहता है अमित
वही उसकी तदबीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 71

तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे

कह दिया तुमने कि आज़ाद हो तुम
तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे जब भाने लगे हैं ।१।

बेदर्द सा चाँद निकला है फ़लक पे
क्या जाने तुझे भूलने में ज़माने लगे हैं ।२।

फ़िर दिल धड़का, फ़िर साँस ली हमने
क्या तेरा फ़साना हम दोहराने लगे हैं ।३।

चुराया दिल मेरा, फिर नींद और चैन
हुए ऐसे शातिर वो नज़रें चुराने लगे हैं ।४।

है वक़्त-ए-रुख़सत, बता दो उन्हें अमित
मना लेना जश्न, हम बस जाने लगे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 68

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