Enough said

Oh man, you are so vain
you think you are so clever
you want redemption,
but do not pay your due

you wantonly disobeyed me
and ate the forbidden fruit
but do you think you could
if I did not want you to

you have CCTV cameras
to spy on thy neighbour
yet, the temerity to think
I don’t have technology too

I am the lord and master
as I will, so you do
If I’m God, why do I
need a bird’s eye view

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 179

तकदीर का मोहरा

गर उसके घर में देर है अंधेरा नहीं है
तो क्यों वो शख़्स अब तक मेरा नहीं है

क्यों नहीं कटती है यह काली रात
एक मेरे ही घर में क्यों सवेरा नहीं है

होते थे हम भी कभी उसको अज़ीज़
अब उसकी तस्वीर में मेरा चेहरा नहीं है

कि काश रोक लेते हम उस दिन उसे
वक़्त किसी के रोके से ठहरा नहीं है

क्या ग़म जो हारा तू यह बाज़ी अमित
है कौन जो तकदीर का मोहरा नहीं है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 178

तू नज़र आता है

ऑंखें बंद कर लूँ तो भी तू नज़र आता है
टूटे आईना-ए-अना में तू नज़र आता है

हुई मुद्दत हमें तेरा विसाल किये हुए
फिर भी हर कल्पना में तू नज़र आता है

कोई हमसे पूछे क्या मज़ा है जलने में
परवाना हूँ शमा में तू नज़र आता है

कभी तो तू छत पर नज़र आ ज़ालिम
यूँ तो चन्द्रमा में तू नज़र आता है

मिलता है हर शख़्स देने तसल्ली अमित
या हर सांत्वना में तू नज़र आता है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 177

ज़िद

बस एक बार कर लो इकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

मत समझो इसको इसरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

नहीं सह पायेंगें हम इंकार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

जाने दो मत करो तकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

हुआ तेरे बिन जीना बेकार
करते तो तुम भी हमसे प्यार

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 174

बह जाता हूँ

यूँ तो समझदारी में कमी नहीं मेरी
जाने क्यों जज़्बातों में बह जाता हूँ

जानता हूँ झूठ है फ़ितरत में तेरी
फिर भी तेरी बातों में बह जाता हूँ

दिन भर तो ख़्याब संभालता हूँ तेरे
कच्चा बाँध हूँ रातों में बह जाता हूँ

कौन तस्सवुर करे रुस्वाई के बाद
आशिक हूँ चाहतों में बह जाता हूँ

सोचता हूँ तोड़ दूँ सारे बंधन अमित
बेबसी है कि नातों में बह जाता हूँ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 173

वक़्त की दहलीज़ पर

होकर बे-आबरू तेरे कूचे पर
बैठा हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

दे मुझे एक टुकड़ा बासी लम्हा
माँगता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

न की पहले कभी कदर तेरी
सोचता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

था ज़माना ठोकर में जिसके
रेंगता है वक़्त की दहलीज़ पर

गर नहीं उसके घर अंधेर अमित
मिलेगा तू वक़्त की दहलीज़ पर

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 172

ऐतबार

न होते हम तो
कौन करता परवाह तुम्हारी
कौन करता तुमसे प्यार इतना

था कौन भला
जो सुनता सभी बातें तुम्हारी
किसपर था तुम्हें अधिकार इतना

सिखाई हमने
तुम्हें प्यार की क़ीमत
क्यों महँगा पड़ा न इज़हार इतना

होकर रुसवा भी
रखोगे मेरे राज़ सभी महफूज़
क्यों करती हूँ तुमपर ऐतबार इतना

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 171

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