शायर की हकीक़त

दास्तान-ए-वस्ल कभी ज़िक्र-ए-फ़िराक
कौन कहे शायर की हकीक़त क्या है

बेसाख़्ता यूँ ही उलट देना निक़ाब
पूछते हो हमें कि क़यामत क्या है

खून-ए-ज़िगर को शमशीर ज़रूरी नहीं
उनकी नज़रों की नज़ाकत क्या है

पूरी वफ़ा से निभाते हैं बेवफ़ाई हमसे
कोई सीखे उनसे सदाक़त क्या है

करते कोशिश दूर करने की “अमित”
बतला देते अगर शिकायत क्या है

तू मुझे भाती है

सोलह सिंगार करके जब तू आती है

सबसे ज्यादा तेरी बिंदी मुझे भाती है

मेरे हाथों में होता है जब चेहरा तेरा

सूरज की सी लालिमा उभर आती है

छा जाती है मन में हरियाली सी

अपने कान में पन्ना जब लटकाती है

हैं कितनी सारी सम्भावनाएँ तुझमें

मेरे लिए तू अपना रूप सजाती है

है नारी तू कोई खिलौना नहीं है

फिर क्यों तू हर बार छली जाती है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 196

Only ifs and…

It was a crazy evening and
don’t think it was extraordinary and
I left her doorstep and
I started walking and
I thought she would follow me and
ask me to stop and
we would be together forever but
that never happened and
she neither followed and
she did not ask me to stop and
I kept on walking and
I have come too far and
I am left only with ifs and…

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 194

Enough said

Oh man, you are so vain
you think you are so clever
you want redemption,
but do not pay your due

you wantonly disobeyed me
and ate the forbidden fruit
but do you think you could
if I did not want you to

you have CCTV cameras
to spy on thy neighbour
yet, the temerity to think
I don’t have technology too

I am the lord and master
as I will, so you do
If I’m God, why do I
need a bird’s eye view

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 179

तकदीर का मोहरा

गर उसके घर में देर है अंधेरा नहीं है
तो क्यों वो शख़्स अब तक मेरा नहीं है

क्यों नहीं कटती है यह काली रात
एक मेरे ही घर में क्यों सवेरा नहीं है

होते थे हम भी कभी उसको अज़ीज़
अब उसकी तस्वीर में मेरा चेहरा नहीं है

कि काश रोक लेते हम उस दिन उसे
वक़्त किसी के रोके से ठहरा नहीं है

क्या ग़म जो हारा तू यह बाज़ी अमित
है कौन जो तकदीर का मोहरा नहीं है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 178

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