बाहिर निकलने से

सूना पड़ा है आज शहर सारा
डरते हैं ख़याल बाहिर निकलने से

ज़हरीली है ज़माने की हवा
डरते हैं ख़याल बाहिर निकलने से

पर घुटता है घर में भी दम
कैसे रोकें ख़याल बाहिर निकलने से

क्या पता था कहर बरपेगा
बस एक ख़याल बाहिर निकलने से

लिखवा दो क़ब्र पर अमित
रह गया ख़याल बाहिर निकलने से 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 139

क़िरदार से हम हैं

नहीं मिलती हैं तक़दीरें हमारी तुम्हारीं
किसी कहानी के क़िरदार से हम हैं

इल्तिज़ा है बदल दो क़िस्मत हमारी  
तुम्हारी मर्ज़ी में गिरफ़्तार से हम हैं

तुम्हीं बक्शों कोई नई वजह जीने की
खुद अपनी हालत से बेज़ार से हम हैं

तुम ही बुलाते नहीं महफ़िल में हमें
कब से आने को बैठे तैयार से हम हैं

जब है इश्क़ खुदा की नेमत अमित
फिर न जाने क्यों शर्मसार से हम हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 138

शिकायत क्या है 

दास्तान-ए-वस्ल कभी ज़िक्र-ए-फिराक़
कौन कहे शायर की हकीक़त क्या है  

बेसाख़्ता यूँ ही उलट देना निक़ाब
पूछते हो हमें कि क़यामत क्या है

खून-ए-ज़िगर को तलवार ज़रूरी नहीं
उनकी नज़रों की नज़ाकत क्या है

पूरी वफ़ा से निभाते हैं बेवफ़ाई हमसे
कोई सीखे उनसे सदाक़त क्या है

करते कोशिश दूर करने की अमित
बतला देते अगर शिकायत क्या है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 137

बीत गए हैं

कब तलक करूँ इंतज़ार तेरा
दो दिन आरज़ू वाले बीत गए हैं

कब तक रहेगा खिज़ा का आलम
मौसम बहारों वाले बीत गए हैं

अभी तो अंधियारी रात बाकी है
कुछ पल बेक़रारी वाले बीत गए हैं

एक दिन तुम्हें याद आएगी हमारी
ख़्याल तसल्ली वाले बीत गए हैं

क्या आओगे तुम सुनकर अमित
कि तुम्हारे चाहने वाले बीत गए हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 136

वो तुम हो

फ़िर आज किसी ने दी सदा मुझे
क्यों हुआ मुझे गुमान वो तुम हो

बदली से निकला है चाँद सुहाना
कहता है ये आसमान वो तुम हो

माँगता हूँ हज़ार मन्नतें रोज़ाना
पर है एक ही अरमान वो तुम हो

कहाँ जाकर ढूँढूं तुम्हें जहाँ में
मेरे ख्यालों में ग़ुमनाम वो तुम हो

क्यों कर रहे हो कोई उम्मीद अमित
उसकी गली में बदनाम, वो तुम हो  

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 135

जिसे घर कहते हैं

थक चुका हूँ भटकते हुए दर-ब-दर
कहाँ है वो जगह जिसे घर कहते हैं

पहले मोड़ पर उसने संग छोड़ दिया
बड़े ख़ुलूस से हम हमसफ़र कहते हैं

बिन पिए ही मेरे कदम बहक रहे हैं
तेरी मदभरी आँखों का असर कहते हैं

क्या जलाएगी कोई और आतिश मुझे
लोग इश्क़ को आग की नहर कहते हैं

तुमने कभी हमको मनाया नहीं अमित
छोड़ देंगें अना भी आप अगर कहते हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 134

मरते देखा है 

वक़्त की आँधी में कुछ नहीं टिकता
हमनें दरख्तों को उखड़ते देखा है

कौन ले जा सका है साथ जमीन
फिर भी भाइयों को लड़ते देखा है

क्या पकड़ सकता है मुट्ठी में अपनी  
बच्चे को परछाई पकड़ते देखा है ?

उम्र भर अकड़ कर जिया था जो
उसे अपने बच्चों से डरते देखा है

वो बिन हमारे जीना सीख गया अमित
जिसे हमने खुद पे मरते देखा है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 133

इश्क़ का ज़हर

पी लिया है तेरे इश्क़ का ज़हर
नहीं दरकार मुझे दवा कोई

इतर सा बिखरा है फिज़ाओं में
छूकर आयी है तुझे हवा कोई

है बेचैनी सी सुबह से ही आज
हुए अरमान फिर जवां कोई

ये आँसूं मेरे अब बहते ही नहीं
कर सकता नहीं ग़म रवां कोई

बैठा है अमित तेरे इंतज़ार में
फिर दिखा अपना जलवा कोई 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 132

ग़ज़ल नई

कोई उम्मीद नहीं उनसे मिलने की
कैसे लिखूँ मैं कोई अब ग़ज़ल नई

वही तन्हाई, वही दर्द, है हिज़्र वही
क्या जज़्बात करे बयां ग़ज़ल नई

इज़हार-ए-इश्क़ करना हुआ मुहाल
न जाने क्या गज़ब ढाए ग़ज़ल नई

उम्र बीती बिना विसाल-ए-यार हुए
सूनी कलम क्या कहे ग़ज़ल नई

तेरी हर अदा खुद है शायरी अमित
क्या खता मेरी जो कहूँ ग़ज़ल नई

In response to: Reena’s Exploration Challenge #131

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