ज़िद

बस एक बार कर लो इकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

मत समझो इसको इसरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

नहीं सह पायेंगें हम इंकार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

जाने दो मत करो तकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

हुआ तेरे बिन जीना बेकार
करते तो तुम भी हमसे प्यार

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 174

बह जाता हूँ

यूँ तो समझदारी में कमी नहीं मेरी
जाने क्यों जज़्बातों में बह जाता हूँ

जानता हूँ झूठ है फ़ितरत में तेरी
फिर भी तेरी बातों में बह जाता हूँ

दिन भर तो ख़्याब संभालता हूँ तेरे
कच्चा बाँध हूँ रातों में बह जाता हूँ

कौन तस्सवुर करे रुस्वाई के बाद
आशिक हूँ चाहतों में बह जाता हूँ

सोचता हूँ तोड़ दूँ सारे बंधन अमित
बेबसी है कि नातों में बह जाता हूँ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 173

वक़्त की दहलीज़ पर

होकर बे-आबरू तेरे कूचे पर
बैठा हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

दे मुझे एक टुकड़ा बासी लम्हा
माँगता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

न की पहले कभी कदर तेरी
सोचता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

था ज़माना ठोकर में जिसके
रेंगता है वक़्त की दहलीज़ पर

गर नहीं उसके घर अंधेर अमित
मिलेगा तू वक़्त की दहलीज़ पर

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 172

ऐतबार

न होते हम तो
कौन करता परवाह तुम्हारी
कौन करता तुमसे प्यार इतना

था कौन भला
जो सुनता सभी बातें तुम्हारी
किसपर था तुम्हें अधिकार इतना

सिखाई हमने
तुम्हें प्यार की क़ीमत
क्यों महँगा पड़ा न इज़हार इतना

होकर रुसवा भी
रखोगे मेरे राज़ सभी महफूज़
क्यों करती हूँ तुमपर ऐतबार इतना

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 171

आशा की किरन

छटी नहीं है ग़म की काली घटा अभी
पर दिखती है आशा की किरन मुझे

कितनी गहरी होगी सोचो प्यास मेरी
लगता है दरया एक कतरा शबनम मुझे

सुनते है भर देता है वक़्त हर घाव
कैसी है यह फिर सीने में चुभन मुझे

किसको फुर्सत सुनता कोई नग़मा मेरा
हर शख़्स मिला अपने में मगन मुझे

नहीं रही मेरी पहले सी सूरत “अमित”
मत दिखलाओ अब कोई दर्पन मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 170

दवा कोई

कर देगी सब कुछ पहले जैसा
सुनते हैं आयी है ऐसी दवा कोई

कुछ इत्र सा फैला है फिज़ाओं में
छूकर आयी है तुझको हवा कोई

ले लेने दो हमको सुकूँ पल दो पल
मत छेड़ फिर से तू शिकवा कोई

क्या है रोज़-ओ-शब नयी बेताबी सी
हुआ अरमाँ मेरा शायद जवां कोई

है भला कहाँ का इन्साफ अमित
करे गलती कोई हो रुसवा कोई

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 169

नया क्या है

है मर्ज़ वही पुराना दवा क्या है
नए साल में आखिर नया क्या है

रखता है परहेज़ वो अब भी मिलने से
शायद नहीं जानता वो दया क्या है

क्या पढ़ेगा वो जो हमने लिखा नहीं
जो पूछता है हमसे बयां क्या है

सूख चुके हों जिन आँखों के आँसूं
वो झुकें भी तो उनकी हया क्या है

करके दिल्लगी हमसे पूछते हो अमित
इस खेल में तुम्हारा गया क्या है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 167

याद है तुम्हें ?

हाथों में देके हाथ जो किया था तुमने
क्या अब भी वो अहद याद है तुम्हें

जहाँ पर आखिरी बार मिले थे हम
ख्यालों की वह सरहद याद है तुम्हें

और वो पहली मुलाकात हमारी
क्या उसका उन्माद याद है तुम्हें

वो जो हम में तुम में करार था
क्या उसकी बुनियाद याद है तुम्हें

की तुमने तो बस दिल्लगी “अमित”
पर हुआ कौन बर्बाद याद है तुम्हें

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 165

तपिश मेरी

जलते हैं अरमान, जलते हैं अल्फाज़ मेरे
तुम तलक पहुँचती नहीं तपिश मेरी

पहले मुझमें चाँद नज़र आता था तुमको
बेअसर कब हो गयी कशिश मेरी

सहेज कर रखा है हर एक दर्द तुम्हारा
महबूब है मुझको अब ख़लिश मेरी

देर तलक देखी थी हमने राह तुम्हारी
इश्क़ से पर जीत गयी रंजिश मेरी

अब क्या यही है तुमसे मिलने की सूरत
कोई तुम से कर दे सिफारिश मेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 164

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