क्या देखता हूँ मैं

तुझ तक पहुँच नहीं सकता
जहाँ तू रहती है
इमारत देखता हूँ मैं

हर ज़र्रे में वुजूद तेरा
कहीं तस्वीर तेरी कहीं
इबारत देखता हूँ मैं

गए वो प्यार में मरने वाले
अब इश्क़ के बाज़ार में
तिज़ारत देखता हूँ मैं

सारी रात जागी है तू भी
तेरी आँखों में खुमार
हरारत देखता हूँ मैं

दे और एक ज़ख्म अमित
ख़ून-ए-जिग़र करने का तुझमें
महारत देखता हूँ मैं

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 69

तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे

कह दिया तुमने कि आज़ाद हो तुम
तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे जब भाने लगे हैं ।१।

बेदर्द सा चाँद निकला है फ़लक पे
क्या जाने तुझे भूलने में ज़माने लगे हैं ।२।

फ़िर दिल धड़का, फ़िर साँस ली हमने
क्या तेरा फ़साना हम दोहराने लगे हैं ।३।

चुराया दिल मेरा, फिर नींद और चैन
हुए ऐसे शातिर वो नज़रें चुराने लगे हैं ।४।

है वक़्त-ए-रुख़सत, बता दो उन्हें अमित
मना लेना जश्न, हम बस जाने लगे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 68

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