मृगतृष्णा

अजीब होते हैं सपने
समाने को समा जाएँ आशियाँ
हाथों की चाँद लकीरों में
फिसलें तो निकल जाएँ
अंजुली से पानी की तरह

करीब होते हैं अपने
तो लगता है शबनम का क़तरा
किसी दरिया की तरह
गर रूठ जाएँ तो सागर
लगे जैसे मृगतृष्णा

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 109

फिर से मुझे

वो कौन है जो सपने में आया है आज
किसने दी है आज सदा फिर से मुझे ।१।

वो ज़ुल्फ़ झटकने का अंदाज़ उसका
याद आयी उसकी अदा फिर से मुझे ।२।

वस्ल-ए-यार से मिलता है इस दिल को सुकूँ
सोचता हूँ कब होगा फ़ायदा फिर से मुझे ।३।

छलका के मय को आँखों से साकी ने
समझा दिया पीने का कायदा फिर से मुझे ।४।

बहुत छला है उम्मीदों ने हमेशा अमित
मत याद दिला कोई वायदा फिर से मुझे ।५।

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