सूरत भी नहीं

अब वस्ल-ए-यार की सूरत भी नहीं
इज़हार-ए-प्यार की सूरत भी नहीं

क्यों पूछता है यह ज़माना हाल मेरा
जब मेरी बीमार सी सूरत भी नहीं

तकता हूँ चेहरा उसका उम्मीद के साथ
अब उसके इकरार की सूरत भी नहीं

उतार दी है कश्ती इस तूफां में मैंने
किस्मत में पतवार की सूरत भी नहीं

क्या ढूंढ़ता है इस आईने में “अमित”
अब तेरी पहले सी सूरत भी नहीं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 155

आशार तेरे हैं

फ़िर आया ख़याल तेरा, फिर निकले आशार नए
ये ख़याल तेरा है या आशार तेरे हैं

जिस सिम्त देखता हूँ, तू ही नज़र आता है
तू ही बतला क्या रूप हज़ार तेरे हैं

चलो आओ करें इस गुलिस्तां का बॅटवारा
रख लो तुम फूल सभी ख़ार मेरे हैं

हर शख़्स लगता है मुझे चोट खाया हुआ
इस शहर में क्या सब बीमार तेरे हैं

क्या करे कोई तुझसे शिकवा गिला अमित
अपनी सफाई में बहाने तैयार तेरे हैं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 153

फ़तह के बाद

हुआ मुहाल करना इज़हार-ए-मुहब्बत
फ़ेर लिया मुँह उसने अपनी फ़तह के बाद

करता रहा इंतज़ार सुनेंगें वो बात मेरी
सुना दिया फ़ैसला अपनी ज़िरह के बाद

क्या ख़ूब सँवारी वो उलझी ज़ुल्फ़ मैंने
उलझती गयी ज़िन्दगी हर गिरह के बाद

क्या परख़ते उनकी बातों की सच्चाई
खुल गयी कलई उनकी सतह के बाद

देख लेता जी भर के उस रोज़ उन्हें अमित
जानता गर नहीं मिलेंगें वो विरह के बाद 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 142

नज़र आता है

ज़ुल्फ़ में बदली, होठों पर शबनम
तेरी सूरत में मुझे सब नज़र आता है

दिखाई देती है हँसी सब को मेरी
यह दर्द भला कब नज़र आता है

एक तो मिलता ही नहीं वो अब हमसे
फेर लेता है आँख जब नज़र आता है

वो जिसे माना था हमने मसीहा अपना
अजनबी सा उसका ढब नज़र आता है

कौन समझ पाया उन आँखों की हकीक़त
कभी कातिल कभी रब नज़र आता है

अजीब फ़ितरत है मेरे यार की “अमित”
बिछड़ा है पर रोज़-ओ-शब् नज़र आता है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 141

Start a Blog at WordPress.com.

Up ↑