मरते देखा है 

वक़्त की आँधी में कुछ नहीं टिकता
हमनें दरख्तों को उखड़ते देखा है

कौन ले जा सका है साथ जमीन
फिर भी भाइयों को लड़ते देखा है

क्या पकड़ सकता है मुट्ठी में अपनी  
बच्चे को परछाई पकड़ते देखा है ?

उम्र भर अकड़ कर जिया था जो
उसे अपने बच्चों से डरते देखा है

वो बिन हमारे जीना सीख गया अमित
जिसे हमने खुद पे मरते देखा है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 133

हिज्र की रात

तुम क्या जानो कैसे बीती
काली वाली हिज्र की रात।

रह रह कर याद आती थी
तुम्हारी कही हुई हर बात।

बहुत गुमान था खुद पर मुझको
तुमने दिखला दी औकात।

मरहम मुझको कौन लगाता
आग लगाती थी बरसात।

दिल को मैंने खूब मनाया
पर ढाक के वही तीन पात।

क्या तुमने की थी दिल्लगी
यहाँ लगे हुए थे जज़्बात।

राहू की यह महा दशा है
या साल शनि के साढ़े सात ?

यूँ ही कटेगी उम्र मेरी अब
या फिर सुधरेंगे हालात ?

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