सपनों के टुकड़े

टूटे सपनों के कुछ टुकड़े
हैं आँखों में चुभते अब भी ।१।

किस्मत से तो लड़ भी लेता
रूठा है मुझसे रब भी ।२।

कितने दिन का हिज़्र है यारों
गिनने बैठूं गर शब् भी ।३।

याद मेरी भी आती होगी
खुद से लड़ती हो जब भी ।४।

ले अपने सर इल्ज़ाम अमित
क्या भूला है तू अदब भी ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 53

अक्स तेरा

एक नज़र का असर है बाकी
थोड़ी शोखी कुछ बेबाकी

अक्स तेरा क्यों ठहर गया है
वक़्त गुज़र गया हालाँकि

मेरी पलकों में अब भी है
पहली मुलाकात की झांकी

तकता हूँ मैं खाली प्याला
संगदिल निकला मेरा साकी

क्यों है जुदा दुनिया से अमित
क्यों न सीखी कुछ चालाकी

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 53

खोया है जबसे तुझे

खोया है जबसे तुझे
कोई शह अब मुझको भाती नहीं

तकता हूँ शीशा मगर
कोई सूरत मुझको नज़र आती नहीं

आह निकले मेरी तो क्या
कोई भी तेरे दिल तक जाती नहीं

थी मेरी हमराज़ कभी
अब तो ग़म भी अपने बतलाती नहीं

है बाकी उम्मीद अमित
वरना अपना रंज यूँ जतलाती नहीं

कब्र के पास

इश्क़ का मैंने ज़हर पिया था
दवा नहीं थी किसी के पास।

हिज्र में बीती सारी रातें
समय नहीं था तेरे पास।

तेरी यादें भी दफना दी
मैंने अपनी कब्र के पास।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 43

हिज्र की रात

तुम क्या जानो कैसे बीती
काली वाली हिज्र की रात।

रह रह कर याद आती थी
तुम्हारी कही हुई हर बात।

बहुत गुमान था खुद पर मुझको
तुमने दिखला दी औकात।

मरहम मुझको कौन लगाता
आग लगाती थी बरसात।

दिल को मैंने खूब मनाया
पर ढाक के वही तीन पात।

क्या तुमने की थी दिल्लगी
यहाँ लगे हुए थे जज़्बात।

राहू की यह महा दशा है
या साल शनि के साढ़े सात ?

यूँ ही कटेगी उम्र मेरी अब
या फिर सुधरेंगे हालात ?

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