तुझसा नहीं ज़लाल

हाँ दीवाना हूँ मैं
चलती हो तुम जैसे
अपनी नयी हर चाल

समझ लेती हो कैसे
मेरे बिना कहे ही
तमाम अनकहे ख़याल

या फिर बिन बोले ही
आँखों ही आँखों में
पूछती हो सवाल

होंगें बहुत हसीं यहाँ
अमित इस दुनिया में
तुझसा नहीं ज़लाल

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 75

मन का अँधेरा

चाँद सा मुखड़ा मेरा
कहाँ देखा है किसी ने
मेरे मन का अँधेरा ।१।

मेरी धीमी मुस्कान
चाहा ही कहाँ तुमने
समझना मेरा सवेरा ।२।

उलझी हुई लट मेरी
संवारेगा कौन भला
इन उलझनों का डेरा ।३।

रंग रूप का खज़ाना
ढूंढ़ती हैं प्यासी आंखें
मेरी तमस का लुटेरा ।४।

मन एक मंदिर मेरा
कौन करेगा आकर
अमित इसमें बसेरा ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 74

तेरे अफ़साने में

पल भर में न कर हिसाब ऐ दोस्त
एक उम्र लगी है तुझे मनाने में ।१।

तू ही चैन का पल दे सुबह मुझे
रात थक गयी है मुझे सुलाने में ।२।

कर लेने दे अपना दीदार ऐ साकी
आज मय नहीं है मेरे पैमाने में ।३।

डर लगता है ज़माने से मुझको
सर छिपाने दो मुझको मैख़ाने में ।४।

कर फिर कोई झूठा वादा अमित
कर लूँ यक़ीन तेरे अफ़साने में ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 73

तेरा माज़ी हूँ मैं

मत छोड़ कर जा मुझे यूँ तन्हा
कि तेरा महबूब, तेरा माज़ी हूँ मैं ।१।

जो भी चाहे सज़ा दे मुझे
अब हर एक सितम को राज़ी हूँ मैं ।२।

क्यों गिनाती हो तुम मुझे गुनाह मेरे
तेरा शरीक़-ए-गुनाह, तेरा क़ाज़ी हूँ मैं।३।

है दुनिया की हर शह क़दमों में तेरे
जो हार गयी हो, वह बाज़ी हूँ मैं ।४।

निकाला गया था खुल्द से आदम अमित
तो क्या उस से बड़ा पाज़ी हूँ मैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 72

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