दिल का शज़र

जब से तुम गए हो शहर
नहीं कटता है एक पहर
वक़्त मानो गया है ठहर
विरह बरसाए हर पल कहर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

आग बरसाए दोपहर
नहीं हवाओं की लहर
दूर लगती है नहर
लगे जीना खुद इक ज़हर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

Social distancing

you had been going distant before
Covid-19 is just an excuse
you stopped talking anymore
you had been going distant before
in my words now I emotions pour
you know, you are my muse
you had been going distant before
Covid-19 is just an excuse

नाइत्तिफ़ाक़ी

रखते हैं वो नाइत्तिफ़ाक़ी मेरे हालत से यूँ
देख अपनी ख़ुमारी समझते हैं शराबी हमको ।१।

सुनकर इज़हार-ए-वफ़ा आती है हँसी उनको
लगती हैं तमाम बातें हमारी किताबी उनको ।२।

न देखे उनको तो नहीं आता है दिल को सुकूं
कौन जाकर समझाए हमारी यह बेताबी उनको ।३।

वो जो देते थे कभी ख़ुदा का दर्ज़ा हमको
हमारे किरदार में दिखती है खराबी उनको ।४।

पाते ही हमने खो दिया पल भर में उन्हें
रास न आयी “अमित” कामयाबी हमको ।५।

इश्क़ की कीमत

देकर चैन अपना, मैंने पायी बेवफाई
तेरे इश्क़ की मैंने बड़ी कीमत चुकाई

क्या देकर खरीदूं वस्ल की एक शाम
इश्क़ के बाज़ार में बढ़ गयी महंगाई

जाती है छोड़ कर पर आती है वापस
तुझसे तो कहीं अच्छी है मेरी परछाई

हर रोज़ खिज़ा में याद आते है वो दिन
तेरे संग मौसम भी लेती थी अंगड़ाई

एक बार फिर झलक दिखला दे अमित
इस से पहले कि जान ले मेरी तन्हाई

तनहा

तनहा हैं मेरे ख्वाब-ओ-ख़याल
मेरी कोई सदा तुझ तलक जाती नहीं ।१।

अंधियारी है अब मेरी हर एक रात
चाँद की मुझ तक झलक आती नहीं ।२।

पुकारना चाहता हूँ तुझे लेकर नाम तेरा
आवाज़ कोई मेरे हलक आती नहीं ।३।

कश-म-कश में हूँ कहाँ लेके जाऊँ इन्हे
बहुत भारी हैं सपने, पलक उठातीं नहीं ।४।

घुट रहा है दम मेरा इस कफ़न में अमित
ज़मीन मेरी नहीं, फलक बुलाती नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 126

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