अंतर्द्वंद

विषाद भरा यह मन मेरा :

नोंच लूँ आसमाँ के तारे तमाम
नोंच लीं थीं तुमनें जैसे ख़ुशियाँ मेरी

तोड़ डालूं इस घर के शीशे सभी
तोड़ दिए थे तुमने जैसे सपने मेरे

जला डालूं इस जहाँ के वुजूद को
जलाती हो ज्यों हिज्र की आग में

मिटा दूँ अपनी हर उम्मीद-ए-ख़ुशी
मिटा दीं जैसे तुमने सब यादें मेरी

सोचता हूँ

जीत जायेंगें मेरे ये ख्वाब-ओ-ख्याल
या बचा लेगी मुझे अच्छाई मेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 49

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