कहीं वो

कैसे करूँ इज़हार दिल की बातें उससे
डरता है दिल कि मान न जाएँ कहीं वो

बेखुदी का आलम, ऐसा है उस ज़ालिम का
उड़े कहीं जुल्फ उसकी और कहीं वो

है एक ही दुनिया जो बनाई उस मालिक ने
फ़िर देखो किस जगह हूँ मैं और कहीं वो

यह सोच कर गुज़र जाती है रात मेरी
सोचता होगा मेरे बारे में शायद कहीं वो

ये जो लिखता फ़िरता है बातें अमित तू
क्या कह सकेगा गर मिल जाए कहीं वो

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