मरीचिका

लहरा दो ज़ुल्फ़ें अपनी
हैं ये प्राण लताएँ
सींच लूँ अपना बंजर तन

महका हुआ यौवन तेरा
बन सर्प लिपटा रहूं
संदल का है सुन्दर वन

गूंजती हैं यादें इसमें
कौन सुनेगा इन्हें
एकाकी है खण्डर मन

तुझसे है रिश्ता कोई
क्यों लगता है तुझे
अमित है चिर दुश्मन

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 85

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