तुम हो

पहुँचते हैं मेरे आशार तुम तक कभी
या मेरी चाहतों से बेख़बर तुम हो ।१।

सूरज की हो पहली किरण तुम या
फ़िज़ाओं में घुलता इतर तुम हो ।२।

नहीं होती हैं पांचों उँगलियाँ बराबर
अनबुझी पहेली, समीकरण तुम हो ।३।

कौन रखता है सभी गुनाहों का हिसाब
मेरी किस भूल का सबब तुम हो ।४।

मेरी हसरतों से ही है कहीं तेरा वज़ूद
हैं मेरी तमन्नाएँ अमित तो तुम हो ।५।

क्यों नहीं

कर के मेरी तमाम खुशियाँ फ़ना
पूछते हो हम मुस्कुराते क्यों नहीं ।१।

रात भर करता हूँ इंतज़ार तेरा
अब तुम रातों को सताते क्यों नहीं ।२।

हँसी ही रहती है लबो पर तेरे
अपने ग़म तुम बतलाते क्यों नहीं ।३।

इतना ही प्यार करते हो मुझे
तो आँखों से जतलाते क्यों नहीं ।४।

कब तक छलेंगें सपने अमित
अपने हैं तो अपनाते क्यों नहीं ।५।

कुछ तो लोग कहेंगे

मतलब निकल जाने पर मुँह मोड़ लेना तेरा
कोई समझे बेहयाई, हम ख़ासियत ही कहेंगे

उलझा कर मुझको खुद सुलझा रहे हैं ज़ुल्फ़ें
कुछ और नहीं इसको, मासूमियत ही कहेंगे

जब भी चाहा तुमने, मेरे इस दिल से खेला
हमने जो तुमको बख़्शी है, सहूलियत ही कहेंगे

सब कुछ जिसपर वार दिया,उसने हमपे वार किया
किसने किसको क्या दिया, हैसियत ही कहेंगे

यूँ जतलाते हैं अमित जैसे कुछ हुआ ही नहीं
इसे आग में न जलने की, क़ाबलियत ही कहेंगे

तलब मुस्कुराने की

हमने ही क़द्र नहीं की शायद तुम्हारे प्यार की
कोशिश तो की थी तुमने पास आने की ।१।

घड़ी भर के लिए तो बैठो हमारे पहलू में
अभी तो आयी हो, करती हो बात जाने की ।२।

सोचता था उम्र पड़ी है सुलझा लूँगा जब चाहूँ
आज इस डोर की बारी है इतराने की ।३।

बहुत तेज़ है अभी वक़्त की हवाओं का मिज़ाज
मैं इंतज़ार में हूँ बवंडर के थम जाने की ।४।

बहुत कुछ गवाया है तूने, कर हिसाब अमित
क्या रंग लायी है तेरी धुन कमाने की ।५।

हमारी तुम्हारी

मिलती ही नहीं
हाथों की लकीरें
हमारी तुम्हारी।१।

हो तुम रूबरू
पर कैसे कहें
हमारी लाचारी।२।

जब से देखा है
उतरती ही नहीं
तुम्हारी खुमारी।३।

जाते जाते जाएगी
है बहुत पुरानी
हमारी बीमारी।४।

भूल गया ज़माना
नहीं होती हैं बातें
हमारी तुम्हारी।५।

Blog at WordPress.com.

Up ↑