कुछ बातें कहने की

देखते हैं उन्हें कुछ कहते नहीं
कुछ बातें कहने की नहीं होती

है चमक उनकी आँखों में भी
सब ज़ीनत गहने की नहीं होती

सोचते हैं उनको अक्सर रातों में
बातें अपने चाहने की नहीं होतीं

कभी तो मिले चाहत का सिला
आशिक़ी सहने की नहीं होती

न कोशिश कर रोकने की “अमित”
क्या नदी जो बहने की नहीं होती

इंतज़ार किसी का

तस्सवुर किसी का न इंतज़ार किसी का
इस दिल को नहीं अब ऐतबार किसी का

सँजोया करती थी कभी ये भी सपने हसीं
आँखें करती नहीं अब दीदार किसी का

न दवा करे असर, न हो दुआ कुबूल
इतना भी न हो कोई बीमार किसी का

आँख खुली तो खुद को अकेला ही पाया
किसी काम नहीं आया करार किसी का

ढल चुका है दिन, कोई न आया “अमित”
मत देख तू अब रस्ता बेकार किसी का

आँखों में तेरी

चर्चा-ए-आम है ज़हानत का तेरी
मैंने देखी है शरारत आँखों में तेरी

यूँ तो तूने न किया इज़हार-ए-वफ़ा
मैंने देखी है इज़ाजत आँखों में तेरी

अब तक क्यों न थामी कलाई मेरी
मैंने देखी है शिकायत आँखों में तेरी

लग चुका है तुझे भी इश्क़ का रोग
मैंने देखी है हरारत आँखों में तेरी

है आज मेरे लुटने की रात “अमित”
मैंने देखी है क़यामत आँखों में तेरी

दस्तक

नई उम्मीद नए हौंसलों ने दस्तक दी है
आज फ़िर नए एक साल ने दस्तक दी है

कहती है मुझसे कदम मिला कर चल
समय की नई एक चाल ने दस्तक दी है

रोकते हैं मुझे पुरज़ोश तमाम ग़म पुराने
पुराने फ़िर एक मलाल ने दस्तक दी है

क्या है अनखुले दरवाज़े की दूसरी तरफ
हिम्मत कर एक सवाल ने दस्तक दी है

नहीं तोड़ेंगें इस बार तेरा ऐतबार “अमित”
फ़िर उम्मीद-ए-विसाल ने दस्तक दी है

रूप मेरा

नाज़ुक उँगलियाँ मेरी कितना उन्हें सुलझती हैं
बेअदब, उन्हें आता देख ज़िद पर उतर जाती हैं

बड़े जतन से क्यों मैं अपना रूप सजाती हूँ
नादान हैं वो बिखरी जुल्फें ही उन्हें भाती हैं

हाल-ए-दिल अपना उनसे जो छिपाती हूँ
चुगल खोर पायल मेरी यूँ ही ख़नक जाती है

काज़ल और बिंदी तो खुद ही मैं लगाती हूँ
लालिमा उन्हें देख जाने कहाँ से आती है

तुम्हें पता हो तो तुम ही मुझे बताओ “अमित”
यह नींद मेरी कहाँ अपनी रात बिताती है

उनका नाम लेते हैं

इक दो का ज़िक्र क्या, तोहमत तमाम देते हैं
करके सितम हमपर, हमें ही इलज़ाम देते हैं

किस सफाई से किया खुद को जुदा हमसे
रुसवा हम ही होते है गर उनका नाम लेते हैं

नहीं टूटा है अब भी उन आँखों का सुरूर
याद उन्हें करते हैं हाथों में जब जाम लेते हैं

क्या हुआ जो शब-ओ-रोज़ उसे याद किया
नहीं मिलेगा वो, अब सब्र से काम लेते हैं

ख़ूब है उनका अंदाज़-ए-तिज़ारत “अमित”
ज़ख्म देते हैं पर हमसे कहाँ वो दाम लेते हैं

पैग़ाम दे के रोए

अब न दोस्ती है, न ही मिलने का चलन
ऐ दोस्त, तुझे इश्क़ का पैग़ाम दे के रोए

नहीं मिलता है सुकूं अब मैखाने में साकी
कल ही की बात है हम जाम ले के रोए

यूँ ही किया करते थे तेरा ज़िक्र सभी से
टूटा दिल, घायल सा ग़ुमान ले के रोए

रोका था ज़माने ने, इश्क़ है एक आतिश
फूँका कलेजा, जलता सा मकां ले के रोए

करके नीलाम इश्क़ को सर-ए-आम “अमित”
यह क्या हुआ तुम तो पूरे दाम ले के रोए

हिसाब यादों का

क्या मोल लगाऊँ एक तरफ़ा यादों का
करने बैठा हूँ आज हिसाब यादों का

एक रोज़ कहा था तूने मुझको अपना
भरम ही होगा यह भी मेरी यादों का

दे कर उम्र अपनी बटोरा है इनको मैंने
न सुकूं दें तो क्या करूँ इन यादों का

आए हिचकी तो प्यास बुझा लेता है तू
है इलाज़ तेरे पास तो मेरी यादों का

इनके सहारे रात गुज़ार लेता हूँ “अमित”
क्या मोल लगाऊंगा भला इन यादों का