शायर की हकीक़त

दास्तान-ए-वस्ल कभी ज़िक्र-ए-फ़िराक
कौन कहे शायर की हकीक़त क्या है

बेसाख़्ता यूँ ही उलट देना निक़ाब
पूछते हो हमें कि क़यामत क्या है

खून-ए-ज़िगर को शमशीर ज़रूरी नहीं
उनकी नज़रों की नज़ाकत क्या है

पूरी वफ़ा से निभाते हैं बेवफ़ाई हमसे
कोई सीखे उनसे सदाक़त क्या है

करते कोशिश दूर करने की “अमित”
बतला देते अगर शिकायत क्या है

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