चेहरा तेरा

सुनता हूँ जब भी कोई गीत पुराना
नज़र आता है अब भी चेहरा तेरा

यह क्या पढ़ लिया है आँखों में मेरी
हुआ क्यों और गुलाबी चेहरा तेरा

मुद्दतें हो गईं तुझको देखे हुए और
सोने नहीं देता मुझको चेहरा तेरा

क्यों है मेरी रात अंधियारी अगर
बदली में चाँद सा है चेहरा तेरा

कौन है इतना ख़ुशनसीब “अमित”
किसके हाथों में अब है चेहरा तेरा

आज हमें याद किया

एहसाँ हुआ जो आज हमें याद किया
क्या किया जो आज हमें याद किया

अपना सितम पुराना याद आया तुझे
सो बेवफ़ा तूने आज हमें याद किया

हवा ने ज़ुल्फ़ तेरी को छेड़ा होगा
गुस्ताख़ समझ आज हमें याद किया

देखा आसमां को जब जमीं पे झुकते हुए
नासमझी पर हँस आज हमें याद किया

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेंगें यह बात “अमित”
बे बात तूने भी आज हमें याद किया

ज़िक्र रक़ीब का

कहाँ मुमकिन था समझना तुझको
कुछ शुक्र रक़ीब का भी करता चलूँ

था वो दिल जीतने के फ़न में माहिर
कुछ ज़िक्र रक़ीब का भी करता चलूँ

तू जो मेरा न हुआ क्या हुआ तू उसका
कुछ फ़िक्र रक़ीब की भी करता चलूँ

उसकी शायरी में तू ही नज़र आता है
कुछ चित्र रक़ीब के भी पढ़ता चलूँ

न होता वो, तो तू मेरा होता “अमित”
यह हिज्र रक़ीब के सर करता चलूँ

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