पत्थर के रब

हूँ शुक्रगुज़ार तेरा ऐ दोस्त
कुछ न रखा तूने पास अपने
सारे इलज़ाम अब मेरे हैं ।१।

तुम्हें फुरसत ही कहाँ थी
जो बता पाता तुम्हें कुछ
अनकहे ख्वाब सब मेरे हैं ।२।

बेहयाई से वो लेता है
अपने संग नाम तेरा
सी लिए हैं जो लब मेरे हैं ।३।

क्यों रश्क़ करूँ तुमसे कि
ज़ीनत-ए-महफ़िल हो तुम
तन्हा रोज़-ओ-शब् मेरे हैं ।४।

क्या माज़रा है अमित
नहीं होती कोई दुआ क़ुबूल
लगता है पत्थर के रब मेरे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 64

बेजारी के पल

किसको है इंतज़ार मेरा
है कौन सी वह जगह
जिसको घर कहते हैं।

बसतीं थीं ख़ुशियों की
गुलशन में कलियाँ कभी
अब ख़ार नुकीले रहते हैं ।

रोक लेते थे कभी तुम
कहके मोती इन्हें – भर
लो झोली अब ये बहते हैं।

कब वफ़ा की थी तुमने
न जाने किस उम्मीद पे
हम सारे ग़म सहते हैं।

मत छीन मुझसे अमित
बेज़ारी के तन्हा पल
अब यही मेरे चेहते हैं।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 64

खामोश निगाहें

करती हैं बयां सब कुछ
मेरी खामोश निगाहें
तेरे सिवा समझेगा कौन
इनकी अनकही कहानी

दिखाए थे तुमने इन्हें
कितने ही सपने हसीं
चुभते हैं अब टुकड़े उनके
कैसे रोकें बहता पानी

हिज्र की है पहली रात
कर लें थोड़ा आराम
नहीं जानतीं हैं बेचारी
अभी तो है उम्र बितानी

खामोश ही रहेंगी ये
नहीं करेंगी कुछ फ़रियाद
नहीं जानतीं हक़ जाताना
करती आईं हैं कुर्बानी

In response to:Reena’s Exploration Challenge #Week 63

दे दे मुझको कोई कहानी

पहचान सकूँ मैं ख़ुदको
दे मुझको कोई दाग भले
छोड़ दे मुझमें कोई निशानी
दे दे मुझको कोई कहानी

नहीं किया था वादा तूने
नहीं कोई खाई थीं कसमें
कहाँ हुई किसी की हानि
दे दे मुझको कोई कहानी

चाहत नहीं मुर्रव्वत थी वो
चूमें नहीं मेरे लब तुमनें
चूमी थी मेरी पेशानी
दे दे मुझको कोई कहानी

इश्क़ किया है मैंने तुझसे
तुझपे है मेरा कुछ हक़
समझना था मेरी नादानी
दे दे मुझको कोई कहानी

बिना कहे तुम छोड़ गए हो
होगी उसकी कोई वज़ह
करती हूँ बातें याद पुरानी
दे दे मुझको कोई कहानी

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 63

चाँद अभी भी मद्धम है

चाँद अभी भी मद्धम है
कब आओगे तुम प्रिय
बन के सूरज मेरे
देकर अपनत्व की गरिमा
करोगे रौशन अंतः मेरा।

चाँद अभी भी मद्धम है
कब आओगे तुम प्रिय
बन के हवा का झोंका
उड़ा के ज़ुल्फ़ें मेरी
करोगे उजागर रँग मेरा।

चाँद अभी भी मद्धम है
कब आओगे तुम प्रिय
बन के मन मीत मेरे
चूम कर अधर मेरे
करोगे कुंदन तन मेरा।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 62

गलती किसकी है

तुम कर रहे थे मुर्रव्व्त
हम सोच बैठे मुहब्बत

गलती किसकी है।१।

सोचते हैं भूल जाएँ तुम्हें
पर इस दिल के आगे

चलती किसकी है।२।

सो गया है जहाँ सारा
तेरी यादों में तन्हा रात

जलती किसकी है।३।

ढून्ढ लेते मीत नया पर
दुनिया में सूरत तुझसे

मिलती किसकी है।४।

मायूसी के आलम में
दिल में उम्मीद अमित

पलती किसकी है।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 61

शायर नहीं हूँ मैं

अपने दिल को कलम बनाकर
तेरी यादों की स्याही से
लिखता हूँ मैं कुछ आशार
शायर नहीं हूँ मैं

हो जाए न रुसवाई तेरी
डरता हूँ सब कहने से
नहीं करता सब इज़हार
कायर नहीं हूँ मैं

चूम न पाता अधरों को तेरे तो
पड़ा रहता क़दमों में तेरे
हो जाता तुझपे निसार
झाँझर नहीं हूँ मैं

तुझसे ही था वज़ूद मेरा
तुझको खोकर अमित
किसका करूँ इंतज़ार
मयस्सर नहीं हूँ मैं

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 61

बीमारी इश्क़ की

अब किस उम्मीद से मैं आवाज़ दूँ तुझे
मेरी कोई बात तुझ तलक जाती नहीं ।१।

ज़माना हो गया है आए हिचकी मुझे
लगता है याद मेरी अब तुझे आती नहीं ।२।

शायद मिल जाती तू मुझे सपनों में कभी
क्या करूँ कमबख़्त नींद ही आती नहीं ।३।

एक आइना था घर में मुझे चाहने वाला
अब उसे भी यह सूरत मेरी भाती नहीं।४।

काश कोई बतला देता मुझे पहले अमित
इश्क़ है ऐसी बीमारी जो कभी जाती नहीं।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 60

अजनबी सी है

जो मैनें कहा
वो तूने सुना ही नहीं
पर हम में कहा सुनी सी है ।१।

कोई ख़ता
जब मुझसे हुई ही नहीं
फिर क्यों तू अनमनी सी है ।२।

ख्वाब कोई
तूने मुझे दिखाया ही नहीं
क्यों दिल में खलबली सी है ।३।

मत पूछ मुझे
मेरे अरमानों का सिला
जैसे चिंगारी कोई दबी सी है ।४।

मेरी तो खैर
थी न कभी भी तू अमित
पर अब तू अजनबी सी है ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 60

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