फ़तह के बाद

हुआ मुहाल करना इज़हार-ए-मुहब्बत
फ़ेर लिया मुँह उसने अपनी फ़तह के बाद

करता रहा इंतज़ार सुनेंगें वो बात मेरी
सुना दिया फ़ैसला अपनी ज़िरह के बाद

क्या ख़ूब सँवारी वो उलझी ज़ुल्फ़ मैंने
उलझती गयी ज़िन्दगी हर गिरह के बाद

क्या परख़ते उनकी बातों की सच्चाई
खुल गयी कलई उनकी सतह के बाद

देख लेता जी भर के उस रोज़ उन्हें अमित
जानता गर नहीं मिलेंगें वो विरह के बाद 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 142

नज़र आता है

ज़ुल्फ़ में बदली, होठों पर शबनम
तेरी सूरत में मुझे सब नज़र आता है

दिखाई देती है हँसी सब को मेरी
यह दर्द भला कब नज़र आता है

एक तो मिलता ही नहीं वो अब हमसे
फेर लेता है आँख जब नज़र आता है

वो जिसे माना था हमने मसीहा अपना
अजनबी सा उसका ढब नज़र आता है

कौन समझ पाया उन आँखों की हकीक़त
कभी कातिल कभी रब नज़र आता है

अजीब फ़ितरत है मेरे यार की “अमित”
बिछड़ा है पर रोज़-ओ-शब् नज़र आता है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 141

एक मुलाकात

याद है वो मंज़र मुझे
उतरती थी सीढ़ियों से तुम
ज्यों उतरता है फ़लक से चाँद ज़मीन पर

आईं थी मुझसे मिलने
शायद दस मिनट देर से आईं थीं
गुज़रती हैं शायद यूँ ही सदियाँ

फिर नज़र आया मुझे
तुम्हारा चेहरा मुझे ढूँढ़ते हुए
ढूँढा करती है क्या शमा परवाने को  

करीब आईं थीं तुम
शायद कुछ कहा भी था तुमने
जो मैंने सुना वो तुमने कहा ही नहीं

एक मुलाकात थी वो
पर यह भी सच है यारों
क़यामत रोज़ रोज़ नहीं हुआ करती

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 141

रिहाई न दो

भाने लगे हैं ये बंधन मुझे
अपनी ज़ुल्फ़ों से रिहाई न दो

प्यास ही देती है तृप्ति मुझे
छीन लो प्याला, सुराही न दो

सच मान चुका हूँ बहाने तेरे
छोड़ दो अब कोई सफ़ाई न दो

ठुकरा चुकी हो खुद जिसे तुम
अब उस रिश्ते की दुहाई न दो

न आगे बढ़ा यह फ़साना अमित
कलम तोड़ दो, रोशनाई न दो

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 140

बाहिर निकलने से

सूना पड़ा है आज शहर सारा
डरते हैं ख़याल बाहिर निकलने से

ज़हरीली है ज़माने की हवा
डरते हैं ख़याल बाहिर निकलने से

पर घुटता है घर में भी दम
कैसे रोकें ख़याल बाहिर निकलने से

क्या पता था कहर बरपेगा
बस एक ख़याल बाहिर निकलने से

लिखवा दो क़ब्र पर अमित
रह गया ख़याल बाहिर निकलने से 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 139

क़िरदार से हम हैं

नहीं मिलती हैं तक़दीरें हमारी तुम्हारीं
किसी कहानी के क़िरदार से हम हैं

इल्तिज़ा है बदल दो क़िस्मत हमारी  
तुम्हारी मर्ज़ी में गिरफ़्तार से हम हैं

तुम्हीं बक्शों कोई नई वजह जीने की
खुद अपनी हालत से बेज़ार से हम हैं

तुम ही बुलाते नहीं महफ़िल में हमें
कब से आने को बैठे तैयार से हम हैं

जब है इश्क़ खुदा की नेमत अमित
फिर न जाने क्यों शर्मसार से हम हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 138

शिकायत क्या है 

दास्तान-ए-वस्ल कभी ज़िक्र-ए-फिराक़
कौन कहे शायर की हकीक़त क्या है  

बेसाख़्ता यूँ ही उलट देना निक़ाब
पूछते हो हमें कि क़यामत क्या है

खून-ए-ज़िगर को तलवार ज़रूरी नहीं
उनकी नज़रों की नज़ाकत क्या है

पूरी वफ़ा से निभाते हैं बेवफ़ाई हमसे
कोई सीखे उनसे सदाक़त क्या है

करते कोशिश दूर करने की अमित
बतला देते अगर शिकायत क्या है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 137

बीत गए हैं

कब तलक करूँ इंतज़ार तेरा
दो दिन आरज़ू वाले बीत गए हैं

कब तक रहेगा खिज़ा का आलम
मौसम बहारों वाले बीत गए हैं

अभी तो अंधियारी रात बाकी है
कुछ पल बेक़रारी वाले बीत गए हैं

एक दिन तुम्हें याद आएगी हमारी
ख़्याल तसल्ली वाले बीत गए हैं

क्या आओगे तुम सुनकर अमित
कि तुम्हारे चाहने वाले बीत गए हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 136

वो तुम हो

फ़िर आज किसी ने दी सदा मुझे
क्यों हुआ मुझे गुमान वो तुम हो

बदली से निकला है चाँद सुहाना
कहता है ये आसमान वो तुम हो

माँगता हूँ हज़ार मन्नतें रोज़ाना
पर है एक ही अरमान वो तुम हो

कहाँ जाकर ढूँढूं तुम्हें जहाँ में
मेरे ख्यालों में ग़ुमनाम वो तुम हो

क्यों कर रहे हो कोई उम्मीद अमित
उसकी गली में बदनाम, वो तुम हो  

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 135

जिसे घर कहते हैं

थक चुका हूँ भटकते हुए दर-ब-दर
कहाँ है वो जगह जिसे घर कहते हैं

पहले मोड़ पर उसने संग छोड़ दिया
बड़े ख़ुलूस से हम हमसफ़र कहते हैं

बिन पिए ही मेरे कदम बहक रहे हैं
तेरी मदभरी आँखों का असर कहते हैं

क्या जलाएगी कोई और आतिश मुझे
लोग इश्क़ को आग की नहर कहते हैं

तुमने कभी हमको मनाया नहीं अमित
छोड़ देंगें अना भी आप अगर कहते हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 134

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