दिल-ओ-दिमाग़

दिमाग़ कहता है बेवफ़ा हैं वो
नहीं मानता दिल उनका कुसूर
मुक़दमे में कौन जीतेगा दलील ।१।

वो रक़ीब से नज़दीकियां उनकी
सब कीं दिमाग़ ने दर्ज़ मगर
पूछे दिल क्या वे इतने अश्लील ।२।

हैं बहुत शातिर वे ,याद करे दिमाग़
उनकी सारी चालाकियाँ
माने दिल अब भी उनको नबील।३।

दिल कहे अमित मना ले उनको
पर रोक लेता है दिमाग
होना पड़ेगा फिर से ज़लील ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 111

बन कर जुगनू

जब रात होती है सबसे स्याह
होती नहीं आशा की किरण
बन कर जुगनू आती हो तुम

जब जीवन लगने लगे वीरान
अर्थहीन, नीरस और रंगहीन
बन कर ख़ुशबू आती हो तुम

दिन भर की आपाधापी में
मिलते हैं कितने ही आघात
बन कर चन्दन आती हो तुम

नहीं रहे जब कोई पूर्वाग्रह
हो चुका हूँ सपनों से आज़ाद
बन कर बंधन आती हो तुम

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 110

मृगतृष्णा

अजीब होते हैं सपने
समाने को समा जाएँ आशियाँ
हाथों की चंद लकीरों में
फिसलें तो निकल जाएँ
अंजुली से पानी की तरह

करीब होते हैं अपने
तो लगता है शबनम का क़तरा
किसी दरिया की तरह
गर रूठ जाएँ तो सागर
लगे जैसे मृगतृष्णा

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 109

फिर से मुझे

वो कौन है जो सपने में आया है आज
किसने दी है आज सदा फिर से मुझे ।१।

वो ज़ुल्फ़ झटकने का अंदाज़ उसका
याद आयी उसकी अदा फिर से मुझे ।२।

वस्ल-ए-यार से मिलता है इस दिल को सुकूँ
सोचता हूँ कब होगा फ़ायदा फिर से मुझे ।३।

छलका के मय को आँखों से साकी ने
समझा दिया पीने का कायदा फिर से मुझे ।४।

बहुत छला है उम्मीदों ने हमेशा अमित
मत याद दिला कोई वायदा फिर से मुझे ।५।

फ़ासला क्यों है

हम दोनों के दरमियान
क्या हुई वो चाहतें
अब यह फ़ासला क्यों है ।१।

बढ़ाऊँ भी मैं हाथ अगर
अब नहीं थामोगे तुम
टूटा हुआ हौंसला क्यों है ।२।

कायनात है क़दमों में मेरे
तो फिर दिल में यह
एहसास-ए-ख़ला क्यों है ।३।

गर इतना ही बुरा हूँ मैं
फिर सुनकर नाम मेरा
सांसों में ज़लज़ला क्यों है।४।

रोज़ आती है रात मगर
नींद नहीं आती अमित
ऐसा यह सिलसिला क्यों है ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #107

पूछूँगा तुम से

एक रोज़ तुम मिलोगे तो पूछूँगा तुम से
क्या मिला तुमको यूँ दिल तोड़ के मेरा ।१।

किस ग़ुरूर से जाते हो ठुकरा के मुझे
क्या जा सकती हो दिल छोड़ के मेरा ।२।

खून का हर क़तरा देगा वफ़ा की गवाही
चाहे तो देख लो दिल निचोड़ के मेरा।३।

कहीं यूँ तो नहीं दिल तोड़ना शौक है तेरा
कितने हुए अब तक दिल जोड़ के मेरा ।४।

नहीं भुला पाया है अब तक यादें तेरी अमित
सोता है उन्हें रात को दिल ओढ़ के मेरा।५।

कभी पाया ही नहीं

वसूलता है साकी दाम उस जाम के
जो उसने मुझे पिलाया ही नहीं ।१।

रही हसरत कभी रूठ कर देखूँ मैं भी
कभी किसी ने मनाया ही नहीं ।२।

है धूप बहुत, कठिन है राह मगर
उसकी ज़ुल्फ़ का साया ही नहीं ।३।

मत दे इलज़ाम मुझे लापरवाही का
क्या खोता उसे, कभी पाया ही नहीं ।४।

क्या मनाता है रंज अमित उस जज़्बे का
जो उसने कभी निभाया ही नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #106

बेख़बर वो हैं

अब तो राह में पहचानते भी नहीं
कहते थे कि मेरे हमसफ़र वो हैं ।१।

होता ज़ुल्फ़, चूम लेता गर्दन उनकी
मेरी हसरतों से बेख़बर वो हैं ।२।

नहीं खाते हैं तरस हालत पे मेरी
रखते भी हैं दिल कि पत्थर वो हैं ।३।

आँखों में है हाँ पर होठों पे इंकार
है यह उनकी अदा कि कायर वो हैं ।४।

नहीं होते हैं अब उनके दीदार अमित
कह दो मैख़ानों से बेअसर वो हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #106

अगर मैं यह जानता

तुझसे न दिल लगाता
अगर मैं यह जानता
मुहब्बत की सज़ा क्या है ।१।

बहार तो न दी मुझे
तूने यह समझा दिया
बेमौसम खिज़ा क्या है ।२।

फ़ेर ली आंखें तूने
तू ही न पिलाये तो
पीने का मज़ा क्या है ।३।

क्या हुई वो कसमें
जब तू साथ नहीं तो
जीना क्या, कज़ा क्या है ।४।

क्या मेरी ख़ुदी अमित
ऐ ख़ुदा तू ही बता
अब तेरी रज़ा क्या है ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 105

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