शून्यता

आशा की कोई किरण छूती नहीं
किसी ज़ज़्बात की अनुभूति नहीं ।१।

नहीं अब उम्मीदों का बोझ मगर
शून्यता का भार कम चुनौती नहीं ।२।

गुज़रती थी हर राह तेरी ओर कभी
अब कोई सदा मुझको बुलाती नहीं ।३।

हो जाऊंगा एक रोज़ यूँ ही फ़ना अमित
होता था मैं चिराग, अब बाती नहीं ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 82

कर लिया समझौता मैंने

नहीं मयस्सर थे फ़क़त मुझे ही गुल
काँटों से ही सजा लिया गुलिस्तां मैंने

कहाँ फुरसत उसे पढ़े वो आशार मेरे
जिस से लिखे थे अफ़साने वाबस्ता मैंने

मुड़ कर देखा ही नहीं उस ज़ालिम ने
देर तलक ताका था उसका रास्ता मैंने

शायद अब भी हो सूरत-ए-विसाल कोई
सुनी हैं इश्क़ की ख़ुशनुमा दास्ताँ मैंने

कब तक करूँ सुबह का इंतज़ार अमित
अंधेरो से ही कर लिया समझौता मैंने

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 81

ज़ख्म तेरे दिए हुए

कुछ और तो मेरे पास नहीं
बस ज़ख्म हैं तेरे दिए हुए
वो क्यों न मुझे अज़ीज़ हों ।१।

मांगता है तू माफ़ी मुझसे
कैसे करूँ ऐतबार तेरा
कुछ लहज़े में तो तमीज़ हो ।२।

न रख मुझसे कोई गिला
वो क्या देगा शिफ़ा तुझे
जो ख़ुद ही तेरा मरीज़ हो ।३।

बस मुझे ही नहीं इज़ाज़त
यूँ दुत्कारता है मुझे अमित
गोया कोई नाचीज़ हो ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 80

दाग अच्छे हैं

दिलाते हैं याद तेरी
देते हैं पहचान मुझे
तो दाग अच्छे हैं ।१।

रातों के रंगीं सपने
या दिन के अँधेरे
कौन से रंग सच्चे हैं ।२।

हसरत ही रही हमारी
चूमते गर्दन को तेरी
ये लापरवाह लच्छे हैं।३।

हो गए जुदा हम
तो क्या प्रेम के
धागे कच्चे हैं ।४।

नहीं तुझ सी महारत
इस खेल में अमित
अभी हम बच्चे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 80

दिल में होली जल रही है

फिर यादों की हवा चली है
कैसी फिर यह आग लगी है
दिल में होली जल रही है ।१।

नशा है कैसा खुली ज़ुल्फ़ का
हुई है मुद्दत पर जाने क्यों
सांसों में भंग सी घुल रही है ।२।

बैठे हो तुम सामने मेरे
समंदर किनारे अल्हड़ शाम
गालों पे लाली मल रही है ।३।

किसने दी है थाप अमित
किसकी पायल की मधुर तान
ज़ज्बातों को यूँ छल रही है।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 79

सबसे जुदा है तू

मुझे क्यों न हो तेरी आरज़ू
कि सबसे जुदा है तू ।१।

नाउम्मीदी के आलम में
मसलसल एक सदा है तू ।२।

होंगें बहुत हसीं दुनिया में
लेकिन खुद अदा है तू ।३।

कर हम पर भी कोई करम
खुद पर ही फ़िदा है तू ।४।

अब इस से ज्यादा क्या कहूँ
सुन ले मेरा खुदा है तू ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 78

न टूटे तारा कोई

किस सिम्त देखूँ
सामने है ज़िन्दगी
और तू पीछे कहीं

वो न छोड़े मुझे
कैसी विडम्बना
तू अपनाये नहीं

कशमकश में हूँ
साँसें हैं मेरी या
कहीं गिरवी रखी

देखूँ आसमां तो
दुआ करे दिल मेरा
न टूटे तारा कोई

चुभता हूँ अब भी
आँखों में तेरी अमित
है यह कैसी नमी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 76

तुझसा नहीं ज़लाल

हाँ दीवाना हूँ मैं
चलती हो तुम जैसे
अपनी नयी हर चाल

समझ लेती हो कैसे
मेरे बिना कहे ही
तमाम अनकहे ख़याल

या फिर बिन बोले ही
आँखों ही आँखों में
पूछती हो सवाल

होंगें बहुत हसीं यहाँ
अमित इस दुनिया में
तुझसा नहीं ज़लाल

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 75

मन का अँधेरा

चाँद सा मुखड़ा मेरा
कहाँ देखा है किसी ने
मेरे मन का अँधेरा ।१।

मेरी धीमी मुस्कान
चाहा ही कहाँ तुमने
समझना मेरा सवेरा ।२।

उलझी हुई लट मेरी
संवारेगा कौन भला
इन उलझनों का डेरा ।३।

रंग रूप का खज़ाना
ढूंढ़ती हैं प्यासी आंखें
मेरी तमस का लुटेरा ।४।

मन एक मंदिर मेरा
कौन करेगा आकर
अमित इसमें बसेरा ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 74

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