धुआँ धुआँ सा इश्क़

अभी तो मिले थे हम, अभी बिछड़ गए
मेरे नसीब में है धुआँ धुआँ सा इश्क़

कुछ दिन तो मुझको दिखाई जन्नत मगर
हँसता है अब मुझपर शैतां सा इश्क़

तरस रहा हूँ प्यार की एक बूँद के लिए
जल रहा इस जून में मकां सा इश्क़

जब भी ज़रुरत पड़ी, कर लिया याद
समझा है क्या तुमने दुकां सा इश्क़

क्यों हुआ इश्क़ में नाकाम तू “अमित”
लगा था सब के लिए है आसां सा इश्क़

दिल का शज़र

जब से तुम गए हो शहर
नहीं कटता है एक पहर
वक़्त मानो गया है ठहर
विरह बरसाए हर पल कहर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

आग बरसाए दोपहर
नहीं हवाओं की लहर
दूर लगती है नहर
लगे जीना खुद इक ज़हर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

नाइत्तिफ़ाक़ी

रखते हैं वो नाइत्तिफ़ाक़ी मेरे हालत से यूँ
देख अपनी ख़ुमारी समझते हैं शराबी हमको ।१।

सुनकर इज़हार-ए-वफ़ा आती है हँसी उनको
लगती हैं तमाम बातें हमारी किताबी उनको ।२।

न देखे उनको तो नहीं आता है दिल को सुकूं
कौन जाकर समझाए हमारी यह बेताबी उनको ।३।

वो जो देते थे कभी ख़ुदा का दर्ज़ा हमको
हमारे किरदार में दिखती है खराबी उनको ।४।

पाते ही हमने खो दिया पल भर में उन्हें
रास न आयी “अमित” कामयाबी हमको ।५।

इश्क़ की कीमत

देकर चैन अपना, मैंने पायी बेवफाई
तेरे इश्क़ की मैंने बड़ी कीमत चुकाई

क्या देकर खरीदूं वस्ल की एक शाम
इश्क़ के बाज़ार में बढ़ गयी महंगाई

जाती है छोड़ कर पर आती है वापस
तुझसे तो कहीं अच्छी है मेरी परछाई

हर रोज़ खिज़ा में याद आते है वो दिन
तेरे संग मौसम भी लेती थी अंगड़ाई

एक बार फिर झलक दिखला दे अमित
इस से पहले कि जान ले मेरी तन्हाई

तनहा

तनहा हैं मेरे ख्वाब-ओ-ख़याल
मेरी कोई सदा तुझ तलक जाती नहीं ।१।

अंधियारी है अब मेरी हर एक रात
चाँद की मुझ तक झलक आती नहीं ।२।

पुकारना चाहता हूँ तुझे लेकर नाम तेरा
आवाज़ कोई मेरे हलक आती नहीं ।३।

कश-म-कश में हूँ कहाँ लेके जाऊँ इन्हे
बहुत भारी हैं सपने, पलक उठातीं नहीं ।४।

घुट रहा है दम मेरा इस कफ़न में अमित
ज़मीन मेरी नहीं, फलक बुलाती नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 126

रात गुज़र जाती है यूँ भी

न वो आएं, न नींद आए
रात गुज़र जाती है यूँ भी

देती है हर इलज़ाम मुझे
हक़ जतलाती है यूँ भी

करे सवाल आँखों आँखों में
मुझसे बतियाती है यूँ भी

“हम आपके हैं ही कौन “
कह बातें मनवाती है यूँ भी

बिखराती है ज़ुल्फ़ चेहरे पे
कभी चाँद छिपाती है यूँ भी

किताबों की दुनिया

नहीं मिलती सभी को उनकी मुहब्बत
हकीक़त नहीं है किताबों की दुनिया

कहा मजनू किसी ने, किसी ने दीवाना
हुआ इश्क़ मिली है ख़िताबों की दुनिया

पूछी उम्र किसी ने, किसी ने दिखाया
मज़हब, पीछे पड़ी है रिवाज़ों की दुनिया

देख कर सिर्फ आँखे, हो जाता था इश्क़
बहुत खूबसूरत थी हिज़ाबों की दुनिया

हर कोई मुझे ही समझाता है “अमित”
समझे सवाल मेरा, ये जवाबों की दुनिया

इन आँखों ने

इन आँखों ने क्या कुसूर किया
क्यों नींद नहीं आती इनको

जब से हुआ है दीदार तेरा
और शह नहीं भाती इनको

पा जाती ये निज़ात अगर
तुम नहीं उलझाती इनको

हैं दिया पर है ज़लाल कहाँ
मयस्सर नहीं बाती इनको

आँसू थे अब सूख चुके हैं
न समझो जज़्बाती इनको

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