तेरे अफ़साने में

पल भर में न कर हिसाब ऐ दोस्त
एक उम्र लगी है तुझे मनाने में ।१।

तू ही चैन का पल दे सुबह मुझे
रात थक गयी है मुझे सुलाने में ।२।

कर लेने दे अपना दीदार ऐ साकी
आज मय नहीं है मेरे पैमाने में ।३।

डर लगता है ज़माने से मुझको
सर छिपाने दो मुझको मैख़ाने में ।४।

कर फिर कोई झूठा वादा अमित
कर लूँ यक़ीन तेरे अफ़साने में ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 73

तेरा माज़ी हूँ मैं

मत छोड़ कर जा मुझे यूँ तन्हा
कि तेरा महबूब, तेरा माज़ी हूँ मैं ।१।

जो भी चाहे सज़ा दे मुझे
अब हर एक सितम को राज़ी हूँ मैं ।२।

क्यों गिनाती हो तुम मुझे गुनाह मेरे
तेरा शरीक़-ए-गुनाह, तेरा क़ाज़ी हूँ मैं।३।

है दुनिया की हर शह क़दमों में तेरे
जो हार गयी हो, वह बाज़ी हूँ मैं ।४।

निकाला गया था खुल्द से आदम अमित
तो क्या उस से बड़ा पाज़ी हूँ मैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 72

लाज़मी तो नहीं

ख्वाब देखता हूँ मैं
हर ख्वाब की ताबीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।१।

तेरे इश्क़ में भी मेरे
जुनूं की तासीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।२।

रंग भले सच्चे हों
सच्ची हर तस्वीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।३।

तेरी नज़रें ही काफ़ी हैं
क़त्ल के लिए शमशीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।४।

जो तू चाहता है अमित
वही उसकी तदबीर हो
यह लाज़मी तो नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 71

तेरी ही क़सक

जिस सिम्त देखता हूँ मैं
तुझमें ही उलझ जाता हूँ
तेरी ही झलक पाता हूँ ।१।

कहाँ खोजूं खुद को मैं
कोई पहचान नहीं मेरी
तेरी ही ललक पाता हूँ ।२।

बदली में ज़ुल्फ़ के साये
सूरज की हर किरन में
तेरी ही दमक पाता हूँ ।३।

आफ़ताब सा चेहरा तेरा
तुझसे आँखें मिलते ही
तेरी ही शफ़क पाता हूँ।४।

बहुत दिन बीते अमित
अब भी शाम-ओ-सहर
तेरी ही क़सक पाता हूँ।५।

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 70

क्या देखता हूँ मैं

तुझ तक पहुँच नहीं सकता
जहाँ तू रहती है
इमारत देखता हूँ मैं

हर ज़र्रे में वुजूद तेरा
कहीं तस्वीर तेरी कहीं
इबारत देखता हूँ मैं

गए वो प्यार में मरने वाले
अब इश्क़ के बाज़ार में
तिज़ारत देखता हूँ मैं

सारी रात जागी है तू भी
तेरी आँखों में खुमार
हरारत देखता हूँ मैं

दे और एक ज़ख्म अमित
ख़ून-ए-जिग़र करने का तुझमें
महारत देखता हूँ मैं

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 69

तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे

कह दिया तुमने कि आज़ाद हो तुम
तेरी ज़ुल्फ़ के पहरे जब भाने लगे हैं ।१।

बेदर्द सा चाँद निकला है फ़लक पे
क्या जाने तुझे भूलने में ज़माने लगे हैं ।२।

फ़िर दिल धड़का, फ़िर साँस ली हमने
क्या तेरा फ़साना हम दोहराने लगे हैं ।३।

चुराया दिल मेरा, फिर नींद और चैन
हुए ऐसे शातिर वो नज़रें चुराने लगे हैं ।४।

है वक़्त-ए-रुख़सत, बता दो उन्हें अमित
मना लेना जश्न, हम बस जाने लगे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 68

पत्थर के रब

हूँ शुक्रगुज़ार तेरा ऐ दोस्त
कुछ न रखा तूने पास अपने
सारे इलज़ाम अब मेरे हैं ।१।

तुम्हें फुरसत ही कहाँ थी
जो बता पाता तुम्हें कुछ
अनकहे ख्वाब सब मेरे हैं ।२।

बेहयाई से वो लेता है
अपने संग नाम तेरा
सी लिए हैं जो लब मेरे हैं ।३।

क्यों रश्क़ करूँ तुमसे कि
ज़ीनत-ए-महफ़िल हो तुम
तन्हा रोज़-ओ-शब् मेरे हैं ।४।

क्या माज़रा है अमित
नहीं होती कोई दुआ क़ुबूल
लगता है पत्थर के रब मेरे हैं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 64

बेजारी के पल

किसको है इंतज़ार मेरा
है कौन सी वह जगह
जिसको घर कहते हैं।

बसतीं थीं ख़ुशियों की
गुलशन में कलियाँ कभी
अब ख़ार नुकीले रहते हैं ।

रोक लेते थे कभी तुम
कहके मोती इन्हें – भर
लो झोली अब ये बहते हैं।

कब वफ़ा की थी तुमने
न जाने किस उम्मीद पे
हम सारे ग़म सहते हैं।

मत छीन मुझसे अमित
बेज़ारी के तन्हा पल
अब यही मेरे चेहते हैं।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 64

खामोश निगाहें

करती हैं बयां सब कुछ
मेरी खामोश निगाहें
तेरे सिवा समझेगा कौन
इनकी अनकही कहानी

दिखाए थे तुमने इन्हें
कितने ही सपने हसीं
चुभते हैं अब टुकड़े उनके
कैसे रोकें बहता पानी

हिज्र की है पहली रात
कर लें थोड़ा आराम
नहीं जानतीं हैं बेचारी
अभी तो है उम्र बितानी

खामोश ही रहेंगी ये
नहीं करेंगी कुछ फ़रियाद
नहीं जानतीं हक़ जाताना
करती आईं हैं कुर्बानी

In response to:Reena’s Exploration Challenge #Week 63

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