दुनिया को

एक तुम हो जिसे अब तक नहीं ख़बर
ज़ाहिर है हमारा राज़-ए-दिल दुनिया को ।१।

सबको पता है किसने किया हलाक़ हमें
क्योंकर कहूँ मैं क़ातिल दुनिया को ।२।

नहीं हुई हम पर तेरी नज़र-ए-करम
क्या पाया जो किया हासिल दुनिया को ।३।

पूछते थे मुझे अकेले क्यों रहते हो
मिलना तेरा हुआ मुश्किल दुनिया को ।४।

हुआ जुर्म कि इश्क़ में नाकाम हुए अमित
लगते थे कभी हम भी क़ाबिल दुनिया को ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #123

मसीहा ही नहीं

लिखना चाहता हूँ बहुत कुछ मगर
कहने सुनने को कुछ रहा ही नहीं ।१।

न जाने ऐसा क्या सुन लिया तुमने
जब मैंने तुमसे कुछ कहा ही नहीं ।२।

जबसे तुम नहीं हो जज़्बात भी नहीं
लब हँसे ही नहीं, आँसु बहा ही नहीं ।३।

बिखरी हुई हैं हर सिम्त यादें तुम्हारीं
जब से तुम गए हो मैं तनहा ही नहीं ।४।

हर दुआ में तुमको ही माँगा है अमित
इबादत सच्ची नहीं या मसीहा ही नहीं।५।

मुझे जीने दे

अगर कभी प्यार किया है मुझे
कर दे दफ़्न मुझे फ़िर जीने दे ।१।

मत दे मुझे कोई ज़ख्म नया
पहले ये चाक-ए-जिगर सीने दे।२।

मत कर यूँ प्यासा रुख़सत मुझे
अपनी आँखों से दो घूँट पीने दे।३।

बरसों से खिज़ा का मौसम है
खुशियों के दो चार महीने दे ।४।

अपनी सूरत भी भूल गया अमित
दे तस्वीर अपनी न आईने दे ।५।

प्यार नहीं

पढ़ लीं हैं जब से ये आँखें तुम्हारीं
कोई क़िताब तो मुझको दरक़ार नहीं ।१।

हाल सुनकर मिलने आओगे तुम शायद
तुम इतने भी पराये, इतने बेज़ार नहीं ।२।

क्या करें तुमसे कोई शिकवा गिला
अब हमें तुम पर कोई अधिकार नहीं।३।

डरता हूँ तेरी इस ख़ामोशी से मैं
तेरे लब्ज़ों में वो पहले सा अंगार नहीं।४।

हो जाऊँगा एक रोज़ यूँ ही तनहा फ़ना
जो दें सहारा वो काँधे चार नहीं ।५।

बेमतलब ही तूने सँजों लिए सपने अमित
थी वो फ़कत मुर्रव्वत कोई प्यार नहीं ।६।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 121

क्या यही प्यार है ?

तुम बिन जिया जाता नहीं
पर तुमसे कहा जाता नहीं
क्या यही प्यार है ?

क्यों लगते हो अपने से
जब तुमसे कोई नाता नहीं
क्या यही प्यार है ?

अपने दिल के राज सभी
कोई यूँ ही बतलाता नहीं
क्या यही प्यार है ?

कैसा यह ख़ुमार है
क्यों यह उतर जाता नहीं
क्या यही प्यार है ?

ले गया यह नींद मेरी
क्यों चैन मुझे लाता नहीं
क्या यही प्यार है ?

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 120

ऐतबार फ़िर जुड़ता नहीं

दिल में अब प्यार उमड़ता नहीं
टूटा हुआ ऐतबार फ़िर जुड़ता नहीं ।१।

खायी है हर बार शिखस्त ही मैंने
अपने नसीब से अब मैं लड़ता नहीं ।२।

ख़ार से हो जिस गुलशन की जीनत
वो पतझऱ में भी उजड़ता नहीं ।३।

ख़ुद बंद कर चुके हो सब दरवाज़े
क्या सोचते हो कि दरवेश बढ़ता नहीं।४।

भूल चुका मुहब्बत के फ़साने अमित
वो आँखों से पढ़ाते नहीं, मैं पढ़ता नहीं ।५।

दिल-ओ-दिमाग़

सोचता भी तुम्हें हूँ, चाहता भी तुम्हें हूँ
दिल-ओ-दिमाग़ पर इस कदर छाई हो तुम ।१।

कुछ और तो ज़हीन ज़ेहन को भाता नहीं
जब से इस पागल दिल को लुभाई हो तुम ।२।

कितनी दूर तक तुम चलोगी साथ मेरे
हो रूह मेरी, या मेरी परछाई हो तुम ।३।

क्या करती हो अभी से ज़िक्र रुख़सत का
कर लूँ दीदार कि अभी तो आयी हो तुम ।४।

कैसे करूँ तुम को लब्ज़ो में बयां अमित
फ़कत ढाई अक्षरों में समाई हो तुम ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 119

वक़्त गुज़रता नहीं

सुनते थे भर देता है वक़्त हर इक जख़्म
उम्र गुज़रे है मेरी, वक़्त गुज़रता नहीं ।१।

दर्द इतना कि पिघला दे हर पत्थर
एक तेरे ही दिल में उतरता नहीं ।२।

हसरत ही रही सँवारुं जुल्फ तेरी
मुकद्दर ही है मेरा जो संवरता नहीं ।३।

दे के इलज़ाम मुझे, आए हैं मनाने
कह दिया मैंने भी – जा सुधरता नहीं ।४।

कर दिए हैं दफ़्न सब ख्वाब अमित
तेरा नाम अब लब पर उभरता नहीं ।५।

पुरानी बातों का

कर दें न फिर से ऑंखें नम
मत कर ज़िक्र पुरानी बातों का ।१।  

इनकी माने तो मेरे हमदम तुम हो
ऐतबार क्या है पुरानी बातों का ।२।  

रह जाए थोड़ा मेरा भी भरम
कुछ रख मान पुरानी बातों का ।३।  

दे रहे हो मुझे नया एक सपना
सौदागर नहीं हूँ पुरानी बातों का ।४।  

न होती वों तो क्या जीता अमित
चल मान एहसान पुरानी बातों का ।५। 

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