अब आज़ाद हूँ मैं

अब ख्वाब तेरे रातों को सताते नहीं
अब रात भर कोई ख्वाब आते नहीं

अब किस बात का बुरा मानूं मैं
अब दोस्त तेरे नाम से चिढ़ाते नहीं

अब वक़्त ही वक़्त तो है पास मेरे
अब मुझसे मिलने तुम तो आते नहीं

अब जहाँ चाहूँ खर्च करूँ पैसे अपने
अब अपना हक़ कोई दिखलाते नहीं

अब मिटा दिए हैं सारे हर्फ़ अमित
अब सितारे कोई नाम लिखवाते नहीं

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 50

अंतर्द्वंद

विषाद भरा यह मन मेरा :

नोंच लूँ आसमाँ के तारे तमाम
नोंच लीं थीं तुमनें जैसे ख़ुशियाँ मेरी

तोड़ डालूं इस घर के शीशे सभी
तोड़ दिए थे तुमने जैसे सपने मेरे

जला डालूं इस जहाँ के वुजूद को
जलाती हो ज्यों हिज्र की आग में

मिटा दूँ अपनी हर उम्मीद-ए-ख़ुशी
मिटा दीं जैसे तुमने सब यादें मेरी

सोचता हूँ

जीत जायेंगें मेरे ये ख्वाब-ओ-ख्याल
या बचा लेगी मुझे अच्छाई मेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 49

जलती भी नहीं

क्या अज़ब आलम है कि
आग लगाती हो मगर

खुद उसमें जलती भी नहीं ।१।

क्या गज़ब सी बात है कि
लुट गए हम पूरे मगर

तेरी कोई गलती भी नहीं ।२।

दूर कभी न जाने की
खायी थी कसमें मगर

हमसे अब मिलती भी नहीं ।३।

दुनिया होती कदमों में
पर तुम साथ नहीं अगर

मेरी कुछ चलती भी नहीं ।४।

क्या होगा अंजाम अमित
दवा असर न करती और

कोई दुआ फलती भी नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 48

पहचान

प्यास से होते हो व्याकुल
तब तो नहीं पूछते हो

कि जल कहाँ से आया।

रोटी का कौर तोड़ते वक़्त
क्या कभी पूछा है

कि अन्न किसने उगाया।

तुम्हारे लिए सरहद पर
हँसते हुए गोली खाने को

मज़हब कभी न आड़े आया।

तो फिर

किस हक़ से पूछते हो तुम

रंग क्या है अपराध करने वाले का
मज़हब क्या है पड़ोस में रहने वाले का
धर्म क्या है भोजन के निवाले का
ओहदा क्या है प्रेम में मतवाले का

आओ

ऐसे एक नए युग का निर्माण करें
जहाँ इंसान होना ही उसकी पहचान हो

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 47

फिर उसकी याद आयी मुझे

आज फिर उसकी याद आयी मुझे
आज फिर दिल में एक कसक उठी

मुरझाने लगा था जो गुलशन
कोई कोयल उसमें चहक उठी

बरसों कहीं दबी हुई एक चिंगारी
आज फिर शोला बनके दहक उठी

उसके बदन की भीनी खुशबू
रोम रोम में मेरे जैसे महक उठी

कौन सा दर्द तुझे याद आया अमित
क्या याद कर आँख तेरी छलक उठी

प्रारब्ध

कितना अच्छा होता गर मैं
फिर से बच्चा बन जाता

जीवन फिर से जी पाता ।१।

समझ पाता बचपन का मोल
माँ का दुलार, डांट के बोल

कुछ खिलोने सहेज पाता ।२।

लड़कपन से क्या लेता मैं
तकिये के नीचे जो सपने थे

आँखों में फिर संजो लाता ।३।

जवानी का वह पहला प्यार
किताब में बंद वह गुलाब

उसकी खुशबू उड़ा लाता ।४।

क्या अलग होता इस बार
गर जीवन फिर से जी पाता

क्या प्रारब्ध से जीत पाता।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 46

थक चुका हूँ मैं

ले और नहीं इन्तेहाँ मेरा,
देते हुए हिसाब थक चुका हूँ मैं ।१।

बची नहीं मेरे पास अना,
बाज़ार-ऐ-इश्क़ में बिक चुका हूँ मैं ।२।

देख कर मुझको न मुस्कुरा,
तेरे एहसानों तले दब चुका हूँ मैं ।३।

देगा मुझको कौन दवा अब,
इश्क़ का ज़हर चख चुका हूँ मैं ।४।

रहा न कुछ भी पास अमित,
सब कुछ तेरे नाम लिख चुका हूँ मैं ।५।

खोया है जबसे तुझे

खोया है जबसे तुझे
कोई शह अब मुझको भाती नहीं

तकता हूँ शीशा मगर
कोई सूरत मुझको नज़र आती नहीं

आह निकले मेरी तो क्या
कोई भी तेरे दिल तक जाती नहीं

थी मेरी हमराज़ कभी
अब तो ग़म भी अपने बतलाती नहीं

है बाकी उम्मीद अमित
वरना अपना रंज यूँ जतलाती नहीं

अनबुझी आग

समंदर है तत्पर मगर
कैसी है यह आग जो बुझती ही नहीं ।१।

ताकता हूँ शीशा मगर
कैसी है यह सूरत जो दिखती ही नहीं ।२।

बनाये कितने पुल मगर
कैसी हैं दूरियां जो मिटती ही नहीं ।३।

कोई वादा नहीं मगर
कैसी है यह आस जो घटती ही नहीं ।४।

मेरे भी थे वो कभी
कैसी है किस्मत जो टिकती ही नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #Week 45

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