तेरी नज़र

दूर हो फिर क्यों हमीं पर रहती है तेरी नज़र
ज़ुर्म नहीं फिर क्यों हमें इल्ज़ाम दे तेरी नज़र

इस उम्मीद से आए हम महफ़िल में तेरी
मयकशी से भरा एक ज़ाम दे तेरी नज़र

क्यों न भला करते तुझसे बयां ये हाल-ए-दिल
जब बे-क़रारी का तेरी पैग़ाम दे तेरी नज़र

किस ना-यक़ीनी से छीन लीं ख़ुशियाँ मेरी
मांगते गर कर देते खुद को तमाम तेरी नज़र

क्यों समय रहते न तू पहचान सका “अमित”
दिखती है मासूम, पर बे-ईमान है तेरी नज़र

चेहरा तेरा

सुनता हूँ जब भी कोई गीत पुराना
नज़र आता है अब भी चेहरा तेरा

यह क्या पढ़ लिया है आँखों में मेरी
हुआ क्यों और गुलाबी चेहरा तेरा

मुद्दतें हो गईं तुझको देखे हुए और
सोने नहीं देता मुझको चेहरा तेरा

क्यों है मेरी रात अंधियारी अगर
बदली में चाँद सा है चेहरा तेरा

कौन है इतना ख़ुशनसीब “अमित”
किसके हाथों में अब है चेहरा तेरा

आज हमें याद किया

एहसाँ हुआ जो आज हमें याद किया
क्या किया जो आज हमें याद किया

अपना सितम पुराना याद आया तुझे
सो बेवफ़ा तूने आज हमें याद किया

हवा ने ज़ुल्फ़ तेरी को छेड़ा होगा
गुस्ताख़ समझ आज हमें याद किया

देखा आसमां को जब जमीं पे झुकते हुए
नासमझी पर हँस आज हमें याद किया

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेंगें यह बात “अमित”
बे बात तूने भी आज हमें याद किया

ज़िक्र रक़ीब का

कहाँ मुमकिन था समझना तुझको
कुछ शुक्र रक़ीब का भी करता चलूँ

था वो दिल जीतने के फ़न में माहिर
कुछ ज़िक्र रक़ीब का भी करता चलूँ

तू जो मेरा न हुआ क्या हुआ तू उसका
कुछ फ़िक्र रक़ीब की भी करता चलूँ

उसकी शायरी में तू ही नज़र आता है
कुछ चित्र रक़ीब के भी पढ़ता चलूँ

न होता वो, तो तू मेरा होता “अमित”
यह हिज्र रक़ीब के सर करता चलूँ

शायर बना डाला

तेरी बेरुख़ी ने मुझको क्या से क्या बना डाला
शबनम के प्यासे कतरे को अंगारा बना डाला

क्या माँगा था तुझसे, तेरा साथ ही तो माँगा था
तूने तो मुझको बिलकुल बेचारा बना डाला

आए थे हम तो डूबने को इश्क़ के समंदर में
दरया भी सुखा दिया, मुझसे किनारा बना डाला

हुआ ग़ुनाह करना तुझसे इज़हार-ए-मुहब्बत
मेरे इश्क़ को तूने फ़साना-ए-चौबारा बना डाला

लिखते थे दास्तान-ए-विसाल, देकर हिज़्र मुझे
“अमित” को तूने शायर दोबारा बना डाला

तुम नहीं होते हो

कहाँ होते हो जब मेरे
ख्यालों में तुम नहीं होते हो

चाँद तो रोज़ निकलता होगा
छत पर तुम नहीं होते हो

शब भर करता हूँ तस्सवुर तेरा
सुबह को तुम नहीं होते हो

कौन कहता है तुमको अपना
तुम जब तुम नहीं होते हो

जाने कैसे जीता होगा “अमित”
संग उसके तुम नहीं होते हो

कोई क्या करे

अब कोई अख्तियार नहीं उसपर
अब उससे गिला कोई क्या करे

जब राह ही बदल ली है उसने
इंतज़ार भला कोई क्या करे

हाथ बढ़ाएं तो चाँद तक नहीं जाता
तुम कहो हौंसला कोई क्या करे

रात आती है, उसका ख़याल आता है
फ़िर वही सिलसिला, कोई क्या करे

ज़िन्दगी नहीं रुकती “अमित”
बीत रहे हैं साल कोई क्या करे

क्या कीजिएगा

भुला तो दें उन्हें इक ही पल में
इन साँसों का मगर क्या कीजिएगा

आए जब भी उन्हें हिचकी कभी
वो प्यास बुझालें तो क्या कीजिएगा

उनके क़दमों तले जन्नत है मगर
जो कुचल दें गुलशन तो क्या कीजिएगा

तपती धूप में बदली का इंतज़ार
वो जुल्फें कटा दें तो क्या कीजिएगा

माँगा है उन्हें हर दुआ में “अमित”
वो काफ़िर कहें हमें तो क्या किजिएगा

अरमानों की फ़सल

आज बैठा हूँ लेकर यादें तेरी
चलो फ़िर कोई ग़ज़ल बनाते हैं

तेरे चेहरे को चाँद का टुकड़ा
तेरी ज़ुल्फ़ों को बादल बनाते हैं

सूरज को तेरे होंठों की लाली
काली रातों को काजल बनाते हैं

कभी खुद को गले का हार तेरे
कभी पैरों की पायल बनाते हैं

खिज़ा के मौसम में आप “अमित”
ख़ूब अरमानों की फ़सल बनाते हैं

भला कौन

जलाए कोई कितने ही चराग़-ए-मसर्रत
बुझा सकेगा इस दिल के अँधेरे भला कौन

क्यों महक़ रहें हैं दिल-ओ-दिमाग़ आज
कल शब ख़्वाब में आया था भला कौन

आया है हर हमदर्द देने तसल्ली मुझे
मर्ज़ मेरा मगर समझ पाया है भला कौन

पस-ए-आईना कौन देता है सदा मुझे
इस घर में मुझे जानता है भला कौन

क्यों ठोकरें खा कर भी समझा नहीं अमित
दुनिया में आख़िर बुरा कौन है भला कौन

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