शायर की हकीक़त

दास्तान-ए-वस्ल कभी ज़िक्र-ए-फ़िराक
कौन कहे शायर की हकीक़त क्या है

बेसाख़्ता यूँ ही उलट देना निक़ाब
पूछते हो हमें कि क़यामत क्या है

खून-ए-ज़िगर को शमशीर ज़रूरी नहीं
उनकी नज़रों की नज़ाकत क्या है

पूरी वफ़ा से निभाते हैं बेवफ़ाई हमसे
कोई सीखे उनसे सदाक़त क्या है

करते कोशिश दूर करने की “अमित”
बतला देते अगर शिकायत क्या है

तू मुझे भाती है

सोलह सिंगार करके जब तू आती है

सबसे ज्यादा तेरी बिंदी मुझे भाती है

मेरे हाथों में होता है जब चेहरा तेरा

सूरज की सी लालिमा उभर आती है

छा जाती है मन में हरियाली सी

अपने कान में पन्ना जब लटकाती है

हैं कितनी सारी सम्भावनाएँ तुझमें

मेरे लिए तू अपना रूप सजाती है

है नारी तू कोई खिलौना नहीं है

फिर क्यों तू हर बार छली जाती है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 196

अल्फाज़ मेरे

कहाँ से लाऊँ अशहार कि गज़ल बने
दफ़्न हैं अल्फाज़ मेरे ख्वाबों के साथ

ये इनायत तुम्हारी कुछ कम तो नहीं
कर दिया मशहूर मुझे ख़िताबों के साथ

उलझा दामन तो समझे राज़-ए-गुलशन
होते हैं काँटे भी अकसर गुलाबों के साथ

महकता है ख़ुश्बू से क़ुतुब खाना मेरा
रखे हैं कुछ ख़त तेरे किताबों के साथ

अच्छा होता तुम चुप ही रहते अमित
क्यों तोड़ा दिल मेरा जवाबों के साथ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 184

ख़ुमारी तेरी

कुछ मय का नशा कुछ बेक़रारी मेरी
शीशे में उतर आयी है ख़ुमारी तेरी

हैं साँसें तेज़, दम है बस निकला सा
जान लेके जायेगी यह बीमारी तेरी

सुर्ख़ होंठों पे उन्माद, आँखों में हसीँ
गोया पूछ्तीं हैं क्या है तैयारी तेरी

चूमते हैं बेहयाई से क्यों गर्दन तेरी
अच्छी नहीं ज़ुल्फ़ों से यह यारी तेरी

है दीवानगी का ऐसा आलम अमित
अब लगती है जुदाई भी प्यारी तेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 183

तकदीर का मोहरा

गर उसके घर में देर है अंधेरा नहीं है
तो क्यों वो शख़्स अब तक मेरा नहीं है

क्यों नहीं कटती है यह काली रात
एक मेरे ही घर में क्यों सवेरा नहीं है

होते थे हम भी कभी उसको अज़ीज़
अब उसकी तस्वीर में मेरा चेहरा नहीं है

कि काश रोक लेते हम उस दिन उसे
वक़्त किसी के रोके से ठहरा नहीं है

क्या ग़म जो हारा तू यह बाज़ी अमित
है कौन जो तकदीर का मोहरा नहीं है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 178

तू नज़र आता है

ऑंखें बंद कर लूँ तो भी तू नज़र आता है
टूटे आईना-ए-अना में तू नज़र आता है

हुई मुद्दत हमें तेरा विसाल किये हुए
फिर भी हर कल्पना में तू नज़र आता है

कोई हमसे पूछे क्या मज़ा है जलने में
परवाना हूँ शमा में तू नज़र आता है

कभी तो तू छत पर नज़र आ ज़ालिम
यूँ तो चन्द्रमा में तू नज़र आता है

मिलता है हर शख़्स देने तसल्ली अमित
या हर सांत्वना में तू नज़र आता है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 177

आवरण

हूँ किताब पढ़कर देखो मुझे
आवरण से न परखना मुझे

पढ़ लेना कुछ अनलिखी बातें
व्याकरण से न परखना मुझे

हर पन्ने पर नाम तुम्हारा है
समर्पण से ही परखना मुझे

दे देना उम्र भर के हसीं सपने
जागरण से न परखना मुझे

चकाचौंध भरी दुनिया में अमित
आचरण से तुम परखना मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 176

अपनी बात

बीती उम्र करते हुए बातें सबकी
चलो आज अपनी बात करते हैं

हुई मुद्दत अब तो खुद से मिले हुए
आज खुद से मुलाक़ात करते हैं

यूँ तो शांत हवा के झोंके से हैं हम
छेड़ो हमें तो झंझावात करते हैं

सीखा हमने हमेशा वफ़ा निभाना
हैं और जो अपनो पे घात करते हैं

है अभी बाकी हम में दम अमित
ऐलान आज हाज़रात करते हैं

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 175

ज़िद

बस एक बार कर लो इकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

मत समझो इसको इसरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

नहीं सह पायेंगें हम इंकार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

जाने दो मत करो तकरार
करते हो तुम भी हमसे प्यार

हुआ तेरे बिन जीना बेकार
करते तो तुम भी हमसे प्यार

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 174

बह जाता हूँ

यूँ तो समझदारी में कमी नहीं मेरी
जाने क्यों जज़्बातों में बह जाता हूँ

जानता हूँ झूठ है फ़ितरत में तेरी
फिर भी तेरी बातों में बह जाता हूँ

दिन भर तो ख़्याब संभालता हूँ तेरे
कच्चा बाँध हूँ रातों में बह जाता हूँ

कौन तस्सवुर करे रुस्वाई के बाद
आशिक हूँ चाहतों में बह जाता हूँ

सोचता हूँ तोड़ दूँ सारे बंधन अमित
बेबसी है कि नातों में बह जाता हूँ

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 173

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