तोड़ दो बंधन

तोड़ दो बंधन सभी
आ जाओ मेरे ज़ानिब
बन कर मेरे हबीब

न मिलो तुम मुझसे
कहाँ है यह वाज़िब
मिले तुम्हें मेरा रक़ीब

कब तक छलेंगें सपने
अब है यही मुनासिब
अपना लूँ अपना नसीब

बन गया काफ़िर अमित
हो तेरा खुदा हाफ़िज़
दे दो मुझे मेरा सलीब

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 92

एक टुकड़ा ज़िन्दगी

दे दे कोई टूटा सपना
या फिर कोई याद पुरानी
आया हूँ दर पर तेरे
दे दे एक टुकड़ा ज़िन्दगी ।१।

आंखें हैं मेरी कश्कोल
बुझा दे मेरी तिश्नगी
दिखा दे एक झलक मुझे
दे दे एक घूँट ज़िन्दगी ।२।

मत बाँट भले ख़ुशी अमित
संजों लेने दे आँसूं अपना
बना लूँगा मोती उसे
दे दे एक बूँद ज़िन्दगी ।३।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 91

भरम मेरा

न मिलती तुम मुझसे
कर देती कोई झूठा वादा
रह जाता भरम मेरा ।१।

बचा कर दामन अपना
कर दिया मुझको मशहूर
क्या कम है करम तेरा ।२।

जलाकर सपने सभी
अब पहचान पाया हूँ मैं
मिज़ाज है गरम तेरा ।३।

ऐसी भी क्या रंजिश जो
तड़पता देख कर मुझको
आनंद है चरम तेरा ।४।

सहकर सारे ज़ख्म अमित
नहीं किया शिकवा कभी
यह तो है धरम मेरा ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 90

कमाल ही तो है

अब तलक ज़िंदा हूँ
तुमपर जां लुटाकर
कमाल ही तो है ।१।

मायूस क्यों है चाँद
सुन के तारीफ तेरी
मिसाल ही तो है ।२।

क्यों खफ़ा हो मुझसे
कुछ कहा तो नहीं
ख़याल ही तो है ।३।

क्योंकर नहीं कहा
खामोश क्यों रहा
मलाल ही तो है ।४।

है भला यह दुनिया
मेरे किस काम की
बवाल ही तो है ।५।

कैसी आस अमित
कैसा है यह मोह
खाल ही तो है ।६।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 88

हवाई किले

आप यूँ ही हमें टहलाते रहें
हम हवाई किले बनाते रहें ।१।

हम दास्तान-ए-इश्क़ सुनाते रहें
आप नादानी पे मुस्कुराते रहें ।२।

आप बेरुख़ी से पेश आते रहें
हम शमा-ए-उम्मीद जलाते रहें ।३।

हाँ जब भी ज़रुरत पड़े हमारी
आप हमको दोस्त बताते रहें ।४।

न कम हो दीवानगी अमित
आप यूँ ही हमें लुभाते रहें।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 87

यादों के गलियारों में

फिर गुज़रा है वो यादों के गलियारों में
कभी गुज़रीं थीं शामें जिसकी बाँहों में

याद है क्या तुम्हें वो भी एक ज़माना था
बिछाते थे आंखें जब तुम हमारी राहों में

अपना न सही, कर इतना एहसान मगर
खो जाने दे मुझे सपनो की पनाहों में

नहीं मिलती है सभी को चाहत अपनी
कुछ उम्र गुज़ार देते हैं अपनी चाहों में

यूँ ही बेलग़ाम लिखता जा रहा हूँ अमित
सोचता हूँ कुछ तो असर होगा आहों में

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 87

तुम्हारे इंतज़ार में

रख दिया है दिल चाकू की धार पे
रिसते हैं ये घाव तुम्हारे इंतज़ार में ।१।

यूँ ही महफ़िल से उठ आया हूँ मैं
शायद हाँ छिपी थी तेरे इंकार में ।२।

और कहीं जाके रुकती नहीं नज़र
उलझ गया है मन तुम्हारे शृंगार में ।३।

उसके घर में देर है अंधेर नहीं हैं
हमने रातें गुज़ार दीं इसी ऐतबार में।४।

वो अब नज़रें चुराने लगा अमित
क्या रखा है ऐसे वस्ल-ए-यार में ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 86

मरीचिका

लहरा दो ज़ुल्फ़ें अपनी
हैं ये प्राण लताएँ
सींच लूँ अपना बंजर तन

महका हुआ यौवन तेरा
बन सर्प लिपटा रहूं
संदल का है सुन्दर वन

गूंजती हैं यादें इसमें
कौन सुनेगा इन्हें
एकाकी है खण्डर मन

तुझसे है रिश्ता कोई
क्यों लगता है तुझे
अमित है चिर दुश्मन

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 85

सुलह कौन करे

है ग़ुरूर तेरा
तो मेरी भी अना
हम दोनों में सुलह कौन करे ।१।

क़त्ल करके मेरा
बन बैठे हो मुंसिफ
अब तुमसे ज़िरह कौन करे ।२।

आए हो तुम मिलने
जब मुझसे सपनो में
इस रात की सुबह कौन करे।३।

उठ चुकी है महफ़िल
सुन के आशार मेरे
तन्हाई में वाह वाह कौन करे।४।

तूने ठुकराया अमित
इस क़यामत के बाद
दुनिया की परवाह कौन करे।५।

In response to – Reena’s Exploration Challenge # 84

Blog at WordPress.com.

Up ↑