हवाई किले

आप यूँ ही हमें टहलाते रहें
हम हवाई किले बनाते रहें ।१।

हम दास्तान-ए-इश्क़ सुनाते रहें
आप नादानी पे मुस्कुराते रहें ।२।

आप बेरुख़ी से पेश आते रहें
हम शमा-ए-उम्मीद जलाते रहें ।३।

हाँ जब भी ज़रुरत पड़े हमारी
आप हमको दोस्त बताते रहें ।४।

न कम हो दीवानगी अमित
आप यूँ ही हमें लुभाते रहें।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 87

यादों के गलियारों में

फिर गुज़रा है वो यादों के गलियारों में
कभी गुज़रीं थीं शामें जिसकी बाँहों में

याद है क्या तुम्हें वो भी एक ज़माना था
बिछाते थे आंखें जब तुम हमारी राहों में

अपना न सही, कर इतना एहसान मगर
खो जाने दे मुझे सपनो की पनाहों में

नहीं मिलती है सभी को चाहत अपनी
कुछ उम्र गुज़ार देते हैं अपनी चाहों में

यूँ ही बेलग़ाम लिखता जा रहा हूँ अमित
सोचता हूँ कुछ तो असर होगा आहों में

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 87

तुम्हारे इंतज़ार में

रख दिया है दिल चाकू की धार पे
रिसते हैं ये घाव तुम्हारे इंतज़ार में ।१।

यूँ ही महफ़िल से उठ आया हूँ मैं
शायद हाँ छिपी थी तेरे इंकार में ।२।

और कहीं जाके रुकती नहीं नज़र
उलझ गया है मन तुम्हारे शृंगार में ।३।

उसके घर में देर है अंधेर नहीं हैं
हमने रातें गुज़ार दीं इसी ऐतबार में।४।

वो अब नज़रें चुराने लगा अमित
क्या रखा है ऐसे वस्ल-ए-यार में ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 86

मरीचिका

लहरा दो ज़ुल्फ़ें अपनी
हैं ये प्राण लताएँ
सींच लूँ अपना बंजर तन

महका हुआ यौवन तेरा
बन सर्प लिपटा रहूं
संदल का है सुन्दर वन

गूंजती हैं यादें इसमें
कौन सुनेगा इन्हें
एकाकी है खण्डर मन

तुझसे है रिश्ता कोई
क्यों लगता है तुझे
अमित है चिर दुश्मन

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 85

सुलह कौन करे

है ग़ुरूर तेरा
तो मेरी भी अना
हम दोनों में सुलह कौन करे ।१।

क़त्ल करके मेरा
बन बैठे हो मुंसिफ
अब तुमसे ज़िरह कौन करे ।२।

आए हो तुम मिलने
जब मुझसे सपनो में
इस रात की सुबह कौन करे।३।

उठ चुकी है महफ़िल
सुन के आशार मेरे
तन्हाई में वाह वाह कौन करे।४।

तूने ठुकराया अमित
इस क़यामत के बाद
दुनिया की परवाह कौन करे।५।

In response to – Reena’s Exploration Challenge # 84

नज़रिया

मेरे अगाध प्रेम को तुमने
हमेशा बंधन ही माना
अपना अपना नज़रिया है।१।

पत्थर ही फेंका किये तुम
कभी डूब कर देखते
कितना गहरा दरिया है ।२।

सर्दी में रूह को सुकूं दे
जून की तपती दोपहर में
तू बेचैनी का ज़रिया है ।३।

दिखती है रौशनी तुम्हें
क्या जानो किस के लिए
पल पल जलता दिया है ।४।

लगता है लतीफा तुम्हें
अमित इस मज़ाक को
मैनें खुद ही जिया है ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 83

शून्यता

आशा की कोई किरण छूती नहीं
किसी ज़ज़्बात की अनुभूति नहीं ।१।

नहीं अब उम्मीदों का बोझ मगर
शून्यता का भार कम चुनौती नहीं ।२।

गुज़रती थी हर राह तेरी ओर कभी
अब कोई सदा मुझको बुलाती नहीं ।३।

हो जाऊंगा एक रोज़ यूँ ही फ़ना अमित
होता था मैं चिराग, अब बाती नहीं ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 82

कर लिया समझौता मैंने

नहीं मयस्सर थे फ़क़त मुझे ही गुल
काँटों से ही सजा लिया गुलिस्तां मैंने

कहाँ फुरसत उसे पढ़े वो आशार मेरे
जिस से लिखे थे अफ़साने वाबस्ता मैंने

मुड़ कर देखा ही नहीं उस ज़ालिम ने
देर तलक ताका था उसका रास्ता मैंने

शायद अब भी हो सूरत-ए-विसाल कोई
सुनी हैं इश्क़ की ख़ुशनुमा दास्ताँ मैंने

कब तक करूँ सुबह का इंतज़ार अमित
अंधेरो से ही कर लिया समझौता मैंने

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 81

ज़ख्म तेरे दिए हुए

कुछ और तो मेरे पास नहीं
बस ज़ख्म हैं तेरे दिए हुए
वो क्यों न मुझे अज़ीज़ हों ।१।

मांगता है तू माफ़ी मुझसे
कैसे करूँ ऐतबार तेरा
कुछ लहज़े में तो तमीज़ हो ।२।

न रख मुझसे कोई गिला
वो क्या देगा शिफ़ा तुझे
जो ख़ुद ही तेरा मरीज़ हो ।३।

बस मुझे ही नहीं इज़ाज़त
यूँ दुत्कारता है मुझे अमित
गोया कोई नाचीज़ हो ।४।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 80

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