जिसे घर कहते हैं

थक चुका हूँ भटकते हुए दर-ब-दर
कहाँ है वो जगह जिसे घर कहते हैं

पहले मोड़ पर उसने संग छोड़ दिया
बड़े ख़ुलूस से हम हमसफ़र कहते हैं

बिन पिए ही मेरे कदम बहक रहे हैं
तेरी मदभरी आँखों का असर कहते हैं

क्या जलाएगी कोई और आतिश मुझे
लोग इश्क़ को आग की नहर कहते हैं

तुमने कभी हमको मनाया नहीं अमित
छोड़ देंगें अना भी आप अगर कहते हैं 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 134

मरते देखा है 

वक़्त की आँधी में कुछ नहीं टिकता
हमनें दरख्तों को उखड़ते देखा है

कौन ले जा सका है साथ जमीन
फिर भी भाइयों को लड़ते देखा है

क्या पकड़ सकता है मुट्ठी में अपनी  
बच्चे को परछाई पकड़ते देखा है ?

उम्र भर अकड़ कर जिया था जो
उसे अपने बच्चों से डरते देखा है

वो बिन हमारे जीना सीख गया अमित
जिसे हमने खुद पे मरते देखा है 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 133

इश्क़ का ज़हर

पी लिया है तेरे इश्क़ का ज़हर
नहीं दरकार मुझे दवा कोई

इतर सा बिखरा है फिज़ाओं में
छूकर आयी है तुझे हवा कोई

है बेचैनी सी सुबह से ही आज
हुए अरमान फिर जवां कोई

ये आँसूं मेरे अब बहते ही नहीं
कर सकता नहीं ग़म रवां कोई

बैठा है अमित तेरे इंतज़ार में
फिर दिखा अपना जलवा कोई 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 132

ग़ज़ल नई

कोई उम्मीद नहीं उनसे मिलने की
कैसे लिखूँ मैं कोई अब ग़ज़ल नई

वही तन्हाई, वही दर्द, है हिज़्र वही
क्या जज़्बात करे बयां ग़ज़ल नई

इज़हार-ए-इश्क़ करना हुआ मुहाल
न जाने क्या गज़ब ढाए ग़ज़ल नई

उम्र बीती बिना विसाल-ए-यार हुए
सूनी कलम क्या कहे ग़ज़ल नई

तेरी हर अदा खुद है शायरी अमित
क्या खता मेरी जो कहूँ ग़ज़ल नई

In response to: Reena’s Exploration Challenge #131

धुआँ धुआँ सा इश्क़

अभी तो मिले थे हम, अभी बिछड़ गए
मेरे नसीब में है धुआँ धुआँ सा इश्क़

कुछ दिन तो मुझको दिखाई जन्नत मगर
हँसता है अब मुझपर शैतां सा इश्क़

तरस रहा हूँ प्यार की एक बूँद के लिए
जल रहा इस जून में मकां सा इश्क़

जब भी ज़रुरत पड़ी, कर लिया याद
समझा है क्या तुमने दुकां सा इश्क़

क्यों हुआ इश्क़ में नाकाम तू “अमित”
लगा था सब के लिए है आसां सा इश्क़

दिल का शज़र

जब से तुम गए हो शहर
नहीं कटता है एक पहर
वक़्त मानो गया है ठहर
विरह बरसाए हर पल कहर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

आग बरसाए दोपहर
नहीं हवाओं की लहर
दूर लगती है नहर
लगे जीना खुद इक ज़हर
वीरान है मेरे दिल का शज़र

नाइत्तिफ़ाक़ी

रखते हैं वो नाइत्तिफ़ाक़ी मेरे हालत से यूँ
देख अपनी ख़ुमारी समझते हैं शराबी हमको ।१।

सुनकर इज़हार-ए-वफ़ा आती है हँसी उनको
लगती हैं तमाम बातें हमारी किताबी उनको ।२।

न देखे उनको तो नहीं आता है दिल को सुकूं
कौन जाकर समझाए हमारी यह बेताबी उनको ।३।

वो जो देते थे कभी ख़ुदा का दर्ज़ा हमको
हमारे किरदार में दिखती है खराबी उनको ।४।

पाते ही हमने खो दिया पल भर में उन्हें
रास न आयी “अमित” कामयाबी हमको ।५।

इश्क़ की कीमत

देकर चैन अपना, मैंने पायी बेवफाई
तेरे इश्क़ की मैंने बड़ी कीमत चुकाई

क्या देकर खरीदूं वस्ल की एक शाम
इश्क़ के बाज़ार में बढ़ गयी महंगाई

जाती है छोड़ कर पर आती है वापस
तुझसे तो कहीं अच्छी है मेरी परछाई

हर रोज़ खिज़ा में याद आते है वो दिन
तेरे संग मौसम भी लेती थी अंगड़ाई

एक बार फिर झलक दिखला दे अमित
इस से पहले कि जान ले मेरी तन्हाई

तनहा

तनहा हैं मेरे ख्वाब-ओ-ख़याल
मेरी कोई सदा तुझ तलक जाती नहीं ।१।

अंधियारी है अब मेरी हर एक रात
चाँद की मुझ तक झलक आती नहीं ।२।

पुकारना चाहता हूँ तुझे लेकर नाम तेरा
आवाज़ कोई मेरे हलक आती नहीं ।३।

कश-म-कश में हूँ कहाँ लेके जाऊँ इन्हे
बहुत भारी हैं सपने, पलक उठातीं नहीं ।४।

घुट रहा है दम मेरा इस कफ़न में अमित
ज़मीन मेरी नहीं, फलक बुलाती नहीं ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 126

रात गुज़र जाती है यूँ भी

न वो आएं, न नींद आए
रात गुज़र जाती है यूँ भी

देती है हर इलज़ाम मुझे
हक़ जतलाती है यूँ भी

करे सवाल आँखों आँखों में
मुझसे बतियाती है यूँ भी

“हम आपके हैं ही कौन “
कह बातें मनवाती है यूँ भी

बिखराती है ज़ुल्फ़ चेहरे पे
कभी चाँद छिपाती है यूँ भी

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