तुम्हें अपना समझते थे

खूब दिया तुमने सिला
तुम्हें अपना समझते थे

आँखों में चुभता है अब
जिसे सपना समझते थे

क्योंकर दिया ये दर्द हमें
गर तड़पना समझते थे

वो था तेरा ही नाम जिसे
तुम जपना समझते थे

बना लिया आदत तूने
हम बचपना समझते थे

ज़ख़्म सिलते नहीं

कोशिशें कर के भी देख लिया
ज़ख़्म सिलते नहीं ।१।

वो जो थे शरीक़-ए-ज़िंदगी
अब तो मिलते नहीं ।२।

रातों को नींद आती नहीं
ख़्वाब छलते नहीं ।३।

अब कहाँ जाएं परवाने कि
चराग़ जलते नहीं ।४।

बेरंग है ज़िन्दगी अमित
खिज़ा में गुल खिलते नहीं ।५।

हँसने की बात

टूटा है दिल कोई खिलौना नहीं
ये हँसने की बात नहीं है ।१।

फिर से कर लूँ ऐतबार तेरा
ऐसे तो हालात नहीं हैं ।२।

डरता हूँ कुछ भी कहने से
महफूज़ मेरे जज़बात नहीं हैं ।३।

जो दे मुझे चैन-ओ-सुकून
क्या ऐसी कोई रात नहीं है ।४।

दे दस्तक ख़ुशी तो सोचे अमित
कहीं ये कोई घात नहीं है ।५।

सोचते रहते हो क्या

होते नहीं जब रुबरु तुम्हारे
सोचते रहते हो क्या हमको ।१।

अपनी आँखों के कोने से
तकते रहते हो क्यों हमको ।२।

अभी अभी तो तुम आये हो
जाने की धमकी देते हमको ।३।

रोज़ बनाते हो नया बहाना
बच्चा समझा है क्या हमको ।४।

खुद को तुम में खो चुके हैं
क्या देखा है खुद में हमको ।५।

किसका रस्ता देख रहे हो

जाने वाला चला गया, अब
किसका रस्ता देख रहे हो ।१।

क्यों नहीं बरस जाते मुझ पर
कबसे तरसता देख रहे हो ।२।

कितने दर्द छिपाये है वो
जिसको हँसता देख रहे हो ।३।

आँसू नहीं दिल का लहू है
उसको रिसता देख रहे हो ।४।

मत खेल जज़्बातों से अमित
क्यों उनको सस्ता देख रहे हो ।५।

बहाना न दो

अब कोई आरज़ू न कोई ज़ुस्तज़ू
मुझे जीने का कोई बहाना न दो ।१।

कभी किसी ने भी न अपनाया मुझे
मत खाओ तरस आब-ओ-दाना न दो ।२।

नहीं होता सब का मुकद्दर बुलंद
मत करो मदद पर उलहाना न दो ।३।

नहीं करना हो जब सौदा मुकम्मल
वाज़िब यह है कि कोई बयाना न दो ।४।

हो जाने दो सपनो से आज़ाद अमित
अब फ़िर कोई बंधन पुराना न दो ।५।

रात पुरानी

निखरा था छत पर चाँद नूरानी
आयी है याद फ़िर रात पुरानी ।१।

बिन सुलाए मुझे खुद सो गयी है
मेरे तकिये पर रात पुरानी ।२।

है क्या कोई सौदागर इसका
किस मोल बिकेगी रात पुरानी ।३।

बढ़ता जाता है ख़ुमार उतना ही
जितनी होती है रात पुरानी ।४।

क्यों नहीं भूल जाता अमित
गयी बात हुई रात पुरानी ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 124

दुनिया को

एक तुम हो जिसे अब तक नहीं ख़बर
ज़ाहिर है हमारा राज़-ए-दिल दुनिया को ।१।

सबको पता है किसने किया हलाक़ हमें
क्योंकर कहूँ मैं क़ातिल दुनिया को ।२।

नहीं हुई हम पर तेरी नज़र-ए-करम
क्या पाया जो किया हासिल दुनिया को ।३।

पूछते थे मुझे अकेले क्यों रहते हो
मिलना तेरा हुआ मुश्किल दुनिया को ।४।

हुआ जुर्म कि इश्क़ में नाकाम हुए अमित
लगते थे कभी हम भी क़ाबिल दुनिया को ।५।

In response to: Reena’s Exploration Challenge #123

मसीहा ही नहीं

लिखना चाहता हूँ बहुत कुछ मगर
कहने सुनने को कुछ रहा ही नहीं ।१।

न जाने ऐसा क्या सुन लिया तुमने
जब मैंने तुमसे कुछ कहा ही नहीं ।२।

जबसे तुम नहीं हो जज़्बात भी नहीं
लब हँसे ही नहीं, आँसु बहा ही नहीं ।३।

बिखरी हुई हैं हर सिम्त यादें तुम्हारीं
जब से तुम गए हो मैं तनहा ही नहीं ।४।

हर दुआ में तुमको ही माँगा है अमित
इबादत सच्ची नहीं या मसीहा ही नहीं।५।

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