वक़्त की दहलीज़ पर

होकर बे-आबरू तेरे कूचे पर
बैठा हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

दे मुझे एक टुकड़ा बासी लम्हा
माँगता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

न की पहले कभी कदर तेरी
सोचता हूँ वक़्त की दहलीज़ पर

था ज़माना ठोकर में जिसके
रेंगता है वक़्त की दहलीज़ पर

गर नहीं उसके घर अंधेर अमित
मिलेगा तू वक़्त की दहलीज़ पर

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 172

ऐतबार

न होते हम तो
कौन करता परवाह तुम्हारी
कौन करता तुमसे प्यार इतना

था कौन भला
जो सुनता सभी बातें तुम्हारी
किसपर था तुम्हें अधिकार इतना

सिखाई हमने
तुम्हें प्यार की क़ीमत
क्यों महँगा पड़ा न इज़हार इतना

होकर रुसवा भी
रखोगे मेरे राज़ सभी महफूज़
क्यों करती हूँ तुमपर ऐतबार इतना

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 171

आशा की किरन

छटी नहीं है ग़म की काली घटा अभी
पर दिखती है आशा की किरन मुझे

कितनी गहरी होगी सोचो प्यास मेरी
लगता है दरया एक कतरा शबनम मुझे

सुनते है भर देता है वक़्त हर घाव
कैसी है यह फिर सीने में चुभन मुझे

किसको फुर्सत सुनता कोई नग़मा मेरा
हर शख़्स मिला अपने में मगन मुझे

नहीं रही मेरी पहले सी सूरत “अमित”
मत दिखलाओ अब कोई दर्पन मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 170

दवा कोई

कर देगी सब कुछ पहले जैसा
सुनते हैं आयी है ऐसी दवा कोई

कुछ इत्र सा फैला है फिज़ाओं में
छूकर आयी है तुझको हवा कोई

ले लेने दो हमको सुकूँ पल दो पल
मत छेड़ फिर से तू शिकवा कोई

क्या है रोज़-ओ-शब नयी बेताबी सी
हुआ अरमाँ मेरा शायद जवां कोई

है भला कहाँ का इन्साफ अमित
करे गलती कोई हो रुसवा कोई

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 169

नया क्या है

है मर्ज़ वही पुराना दवा क्या है
नए साल में आखिर नया क्या है

रखता है परहेज़ वो अब भी मिलने से
शायद नहीं जानता वो दया क्या है

क्या पढ़ेगा वो जो हमने लिखा नहीं
जो पूछता है हमसे बयां क्या है

सूख चुके हों जिन आँखों के आँसूं
वो झुकें भी तो उनकी हया क्या है

करके दिल्लगी हमसे पूछते हो अमित
इस खेल में तुम्हारा गया क्या है

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 167

याद है तुम्हें ?

हाथों में देके हाथ जो किया था तुमने
क्या अब भी वो अहद याद है तुम्हें

जहाँ पर आखिरी बार मिले थे हम
ख्यालों की वह सरहद याद है तुम्हें

और वो पहली मुलाकात हमारी
क्या उसका उन्माद याद है तुम्हें

वो जो हम में तुम में करार था
क्या उसकी बुनियाद याद है तुम्हें

की तुमने तो बस दिल्लगी “अमित”
पर हुआ कौन बर्बाद याद है तुम्हें

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 165

तपिश मेरी

जलते हैं अरमान, जलते हैं अल्फाज़ मेरे
तुम तलक पहुँचती नहीं तपिश मेरी

पहले मुझमें चाँद नज़र आता था तुमको
बेअसर कब हो गयी कशिश मेरी

सहेज कर रखा है हर एक दर्द तुम्हारा
महबूब है मुझको अब ख़लिश मेरी

देर तलक देखी थी हमने राह तुम्हारी
इश्क़ से पर जीत गयी रंजिश मेरी

अब क्या यही है तुमसे मिलने की सूरत
कोई तुम से कर दे सिफारिश मेरी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 164

बीमार नहीं हूँ

बदल गया है ज़माने का चलन
घर पर हूँ पर लाचार नहीं हूँ
अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार नहीं हूँ

मिल नहीं पाता हूँ अब उनसे
मुनासिब है भूल जाऊँ उन्हें
कह दो उनसे मैं तैयार नहीं हूँ

मिला है वक़्त सोचने का मुझे
जो भी किया अच्छा बुरा
अपने किये पे शर्मसार नहीं हूँ

करता हूँ कुछ ज्यादा काम
खटता हूँ रोज़ सुबह से शाम
शुक्र है कि बेरोज़गार नहीं हूँ

रखता हूँ अपना ख़याल ज्यादा
एक ज़िन्दगी तो हज़ार नेमत
मनाता हूँ खैर, बीमार नहीं हूँ

In Response to: Reena’s ~Exploration Challenge # 163

इबादत

करके इबादत बना दिया मैंने खुदा तुझे
डरता हूँ अब बख़्शेगा क्या मेरा ख़ुदा मुझे

होते थे खुश सुनकर कभी हमसे अपनी तारीफ़
लगती है अब गुस्ताखी सी क्यों ऐ ख़ुदा तुझे

सुनते थे कि प्यार का भूखा होता है ख़ुदा
लगती नहीं क्यों वो पहले सी भूख ख़ुदा तुझे

काश करता कोई हमसे भी मुहब्बत हम सी
सिखला देते कैसा होता है खुदा तुझे

लगता है डर तेरी ऊँचाइयों से “अमित”
कैसे पहुंचूँ तुझ तक बतला दे ख़ुदा मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 162

तम नहीं है

यूँ तो ज़िन्दगी में अँधेरे कम नहीं हैं
जब तुम हो संग हमारे, तम नहीं है

छट चुकी है सारी ग़म की घटाएँ
देख लो आँखें हमारी नम नहीं हैं

दिवाली पे देख रौनक तेरी कैसे कहें
है अमावस की रात, पूनम नहीं है

कह देता तुझसे प्यार नहीं है मुझे
पर कैसे कहूं क्या मेरा अन्तर्मन नहीं है

छोड़ कर गली तेरी कहाँ जाऊँ “अमित”
है कौन जगह जहाँ तेरी अंजुमन नहीं है

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 161

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