कोई क्या करे

अब कोई अख्तियार नहीं उसपर
अब उससे गिला कोई क्या करे

जब राह ही बदल ली है उसने
इंतज़ार भला कोई क्या करे

हाथ बढ़ाएं तो चाँद तक नहीं जाता
तुम कहो हौंसला कोई क्या करे

रात आती है, उसका ख़याल आता है
फ़िर वही सिलसिला, कोई क्या करे

ज़िन्दगी नहीं रुकती “अमित”
बीत रहे हैं साल कोई क्या करे