न रहे


तुम तुम न रहो, हम हम न रहें
हम दोनों के दरम्यां कोई फासला न रहे

छीन लो मुझसे तमाम प्यास मेरी
हो सामने जाम, उठाने का हौसला न रहे

यूँ मिटा दो अपने सभी शिकवे गिले
फिर रूठने मनाने का सिलसिला न रहे 

मिले सज़ा न मिले वज़ह-ए-सज़ा
किसी भी गुनाह का ऐसा सिला न रहे

हो क़ातिल तुम्हीं बन बैठे हो मुंसिफ़
“अमित” के हाथ कोई फैसला न रहे 

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 158

हँसने की बात

टूटा है दिल कोई खिलौना नहीं
ये हँसने की बात नहीं है ।१।

फिर से कर लूँ ऐतबार तेरा
ऐसे तो हालात नहीं हैं ।२।

डरता हूँ कुछ भी कहने से
महफूज़ मेरे जज़बात नहीं हैं ।३।

जो दे मुझे चैन-ओ-सुकून
क्या ऐसी कोई रात नहीं है ।४।

दे दस्तक ख़ुशी तो सोचे अमित
कहीं ये कोई घात नहीं है ।५।

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