इबादत

करके इबादत बना दिया मैंने खुदा तुझे
डरता हूँ अब बख़्शेगा क्या मेरा ख़ुदा मुझे

होते थे खुश सुनकर कभी हमसे अपनी तारीफ़
लगती है अब गुस्ताखी सी क्यों ऐ ख़ुदा तुझे

सुनते थे कि प्यार का भूखा होता है ख़ुदा
लगती नहीं क्यों वो पहले सी भूख ख़ुदा तुझे

काश करता कोई हमसे भी मुहब्बत हम सी
सिखला देते कैसा होता है खुदा तुझे

लगता है डर तेरी ऊँचाइयों से “अमित”
कैसे पहुंचूँ तुझ तक बतला दे ख़ुदा मुझे

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 162

तम नहीं है

यूँ तो ज़िन्दगी में अँधेरे कम नहीं हैं
जब तुम हो संग हमारे, तम नहीं है

छट चुकी है सारी ग़म की घटाएँ
देख लो आँखें हमारी नम नहीं हैं

दिवाली पे देख रौनक तेरी कैसे कहें
है अमावस की रात, पूनम नहीं है

कह देता तुझसे प्यार नहीं है मुझे
पर कैसे कहूं क्या मेरा अन्तर्मन नहीं है

छोड़ कर गली तेरी कहाँ जाऊँ “अमित”
है कौन जगह जहाँ तेरी अंजुमन नहीं है

In Response to: Reena’s Exploration Challenge # 161

तसव्वुर तेरा किए हुए

बैठे रहे हम घंटो तसव्वुर तेरा किए हुए
डूबते उबरते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

वक़्त-ए-वस्ल कुछ यूँ लगा नश्तर तेरा
तुझपे हम मरते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

कर दिया जो तूने कल मिलने का वादा
शब को सहर करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

हुआ जो भी अब तक हमारे संग अच्छा बुरा
तेरे नज़र करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

होती है दिल से दिल की राह “अमित”
तुझको खबर करते रहे तसव्वुर तेरा किए हुए

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 160

पढ़वा देना उनको

हाल-ए-दिल तमाम पढ़वा देना उनको
मेरी कतबा-ए-मज़ार पढ़वा देना उनको

हुआ फ़ना एक और आशिक़ उनका
सुर्ख़ी-ए-अखबार पढ़वा देना उनको

बहुत देर कर दी आने में उन्होंने
खुली आँखों में इंतज़ार पढ़वा देना उनको  

पा जाएँ मंज़िल अपनी जज़्बात मेरे
अनखुले ख़त हज़ार पढ़वा देना उनको

गर बचीं हो कुछ साँसें “अमित” अभी
मेरा पैग़ाम-ए-इज़हार पढ़वा देना उनको

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 159

फिर भी

तेरी आँखों में डूब के देखा फिर भी
माप सका न तेरी गहराई फिर भी

रह नहीं सकते बिन हमारे एक पल
करते हो क्यों हमसे लड़ाई फिर भी

जब मालूम था अंज़ाम-ए-मुहब्बत
क्यों अपनी जान फसाई फिर भी

क्यों नहीं मिलती है रौशनी हमें
खुद घर में आग लगाई फिर भी

मालूम है वो हैं बेमुरव्वत “अमित”
देता है क्या उनकी दुहाई फिर भी

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 157

कब तक

इस दिल को सताएगी तेरी याद कब तक
है तुझसे मेरे इश्क़ की मियाद कब तक

खोल कर ज़ुल्फ़ मुझसे करते हैं ताकीद
क्या है इरादा, होगा तू बर्बाद कब तक

किसे ढूँढ़ती फिरा करती हैं ये निगाहें तेरी
जा चुका है, करता वो फ़रियाद कब तक

कौन आया कल रात फ़िर ख़्याब में मेरे
मेरी जुबाँ पे बाकी किसका स्वाद अब तक

क्यों नहीं हुआ तू नाउम्मीद अब तक “अमित”
किस याद ने रखा है तुझे शाद अब तक

In response to: Reena’s Exploration Challenge # 156

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